सालों तक बर्फ में दबे रहने वाले केदारेश्वर मंदिर के चमत्कारी तथ्य !


सालों तक बर्फ में दबे रहने वाले केदारेश्वर मंदिर के चमत्कारी तथ्य !
                  भारतीय के देवभूमि माने जाने वाले उत्तराखंड में गिरिराज हिमालय की सबसे ऊँची केदार नामक चोटी पर स्थित है देश का सर्वोच्च केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर, जो देशभर के सभी 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। ये मंदिर अपने आम में कई पौराणिक रहस्यों और चमत्कारों को समेटे हुए हैं, जिसका उदाहरण देते हुए आपको केदारनाथ धाम और मंदिर के संबंध में कई पौराणिक कथाएं सुनने को भी मिल जाएगी।

केदारेश्वर मंदिर को लेकर वैज्ञानिकों का बड़ा दावा
                  इन्हीं चमत्कारों में से एक चमत्कार का दावा स्वयं देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट के एक बड़े प्रसिद्ध वैज्ञानिक के द्वारा किया गया। जिसमें उन्होंने ये माना कि 13वीं से 17वीं शताब्दी तक यानी लगभग 400 साल पहले एक भयानक हिमयुग आया था जिसमें हिमालय का एक बड़ा क्षेत्र बर्फ के अंदर दब गया था और उसके साथ ही ये मंदिर भी बर्फ की गोद में समा गया था। लेकिन सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात ये थी कि 400 साल बाद जब बर्फ से इस मंदिर को दोबारा निकाला गया तो मंदिर पूर्णत: सुरक्षित निकला था, जिसे किसी चमत्कार से कम नहीं माना गया। इस दावे के सबूत आपको आज भी मंदिर की दीवार और पत्थरों पर निशान के तौर पर देखने को मिल जाएंगे।
                  तो चलिए अब इस लेख के माध्यम से हम आपको बताते हैं कि 400 साल तक हिमालय की गोद में छुपे रहने वाले केदारनाथ मंदिर से जुड़े कुछ अन्य रोचक लेकिन रहस्मयी तथ्यों के बारे में :-

पहला रहस्य : 3 ऊँचे पहाड़ और 5 नदियों का होता है संगम
                  ये पवित्र केदारनाथ धाम एक तरफ से करीब 22 हजार फुट ऊँचे केदार पहाड़, दूसरी तरफ से करीब 21 हजार 600 फुट ऊँचे खर्चकुंड और तीसरी तरफ 22 हजार 700 फुट ऊँचें भरतकुंड के पहाड़ के बीच स्थित है।
                  आपको जानकार ये हैरानी भी होगी कि प्रकृति की गोद में बसा ये मंदिर न सिर्फ 3 पहाड़ों से घिरा हुआ है बल्कि यहाँ 5 नदियों का सुन्दर संगम भी होता है।
                  यहाँ मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी नदियों के दर्शन करने को मिलते हैं। इन सभी नदियों में से अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी नदी आज भी मौजूद दिखाई देती है, जिसके किनारे ही केदारेश्वर धाम स्थित है। इस घाटी में जहाँ सर्दियों के समय भारी बर्फ से चारों तरह बर्फ की परत बिछ जाती है तो वहीं बारिश में ज़बरदस्त पानी से ये जगह अपने विक्रांत रूप में दिखाई देती है।
दूसरा रहस्य: किसी चट्टान से कम नहीं है ये प्राचीन मंदिर
                  केदारनाथ मंदिर कटवां पत्थरों के भूरे रंग के विशाल और मजबूत शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है, जो भारतीय संस्कृत का बेहद सुन्दर नमूना प्रतीत होता है। इस मंदिर की दीवारे करीब 6 फुट ऊँचे चबूतरे पर खड़ी है। जो लगभग 85 फुट ऊँची, 187 फुट लंबी, करीब 80 फुट चौड़ी है और 12 फुट मोटी हैं। जो इसे हर मौसम में डटे रहने की शक्ति देती हैं। माना जाता है कि ये मंदिर पौराणिक काल के कुछ अवशेषों के बाद निर्मित किया गया था। जिसमें पत्थरों को छत और दीवारों से जोड़ने के लिए खास इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
तीसरा रहस्य : पांडवों ने किया था सबसे पहले मंदिर का निर्माण
                  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर के पीछे एक अन्य मंदिर का निर्माण सबसे पहले खुद पांडवों ने किया था, परन्तु समय के साथ वो मंदिर माना जाता है कि बर्फ में ही लुप्त हो गया। पांडवों द्वारा निर्मित मंदिर के लुप्त होने के बाद 508 ईसा पूर्व जन्मे और 476 ईसा पूर्व देहत्याग गए आदिशंकराचार्य ने मौजूदा केदारनाथ मंदिर का निर्माण कराया था। इस मंदिर के पीछे आपको आदिशंकराचार्य की समाधि के भी दर्शन करने को मिलते हैं। जबकि मंदिर का गर्भगृह अपेक्षाकृत प्राचीन बताया जाता है जिसे 80वीं शताब्दी के समयकाल का माना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार 10वीं सदी में मालवा के राजा भोज ने इस मंदिर की मरम्मत का कार्य कराया था।
चौथा रहस्य : चमत्कारी रूप से दीपक होता है प्रज्वलित
                  हर साल दीपावली के दूसरे दिन यानी शीत ऋतु में केदारनाथ मंदिर के द्वार बंद किये जाने का विधान है। जिसके बाद करीब 6 माह तक मंदिर के अंदर एक दीपक हमेशा जलता रहता है। इस मंदिर के पुरोहित मंदिर के सभी पट बंद कर भगवान के विग्रह एवं दंडी को 6 माह तक पहाड़ के नीचे ऊखीमठ में ले जाते हैं। जिसके करीब 6 माह के बाद ही मई के दौरान दोबारा केदारनाथ मंदिर के कपाट भक्तों के लिए खोल दिए जाते हैं। मान्यता है कि जब 6 माह की अवधि तक मंदिर के कपाट बंद रहते हैं तो मंदिर के आसपास दूर-दूर तक कोई प्राणी नहीं रहता है। ऐसे में ये चमत्कार ही है कि किसी के भी मौजूद न होने के बाद भी मंदिर के अंदर 6 माह तक लगातार एक दीपक जलता रहता है, जिसके द्वारा मंदिर में कभी अंधेरा नहीं होता। माना जाता है कि जिस वक़्त 6 माह की अवधि के बाद पुरोहित कपाट खोलते हैं, उस वक़्त उन्हें मंदिर के अंदर साफ-सफाई भी मिलती है।
पांचवां रहस्य: 2013 में आई प्रलय भी मंदिर का कुछ नहीं बिगाड़ पाई
                  कई साल पहले जब 16 जून 2013 की रात प्रकृति ने अपना तांडव दिखाया था और उत्तराखंड पूरी तरह से तबाह हो गया था तब भी इस मंदिर को एक खरोच तक नहीं आई  थी जिसके बाद इसे और भी ज्यादा महत्व और पवित्र माना जाने लगा। वैज्ञानिक भी इस बात से हैरान थे कि उस तबाही में पहाड़ों से पानी के साथ बड़ी-बड़ी चट्टाने मंदिर तक तो आईं लेकिन वो सभी अचानक मंदिर के पीछे ही रुक गई। जिसके चलते उस चट्टानों ने कुछ बेहद अदभुद तरीके से बाढ़ का पानी 2 भागों में विभाजित किया जिसके चलते मंदिर में मौजूद किसी भी व्यक्ति को कुछ नहीं हुआ। याद रहे कि 2013 में आई इस प्रलय में लगभग 10 हजार लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी थी।
छठा रहस्य : हुई ये बड़ी भविष्यवाणी
                  इस पवित्र धाम को लेकर पुराणों में भी कई अहम भविष्यवाणी की गई हैं, जिसके अनुसार कलयुग में इस समूचे क्षेत्र के तीर्थ लुप्त हो जाएंगे। उस विनाशकाय भविष्यवाणी के अनुसार, एक दिन नर और नारायण पर्वत का आपस में मिलन होगा, जिसके चलते इस मंदिर का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएगा। इस तरह मंदिर दोबारा प्रकृति की गोद में लुप्त हो जाएगा और भक्त इस धाम के दर्शन नहीं कर पाएंगे। जिसके वर्षों बाद ‘भविष्यबद्री’ नामक नए तीर्थ का उद्गम हो सकेगा।

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