नागरिकता (संशोधन) कानून की आवश्यकता क्यों?


नागरिकता (संशोधन) कानून की आवश्यकता क्यों?
                     "यहाँ मुश्किल से 3,000 हिन्दू और सिख रहते हैं। कुछ सालों पहले तक हिन्दू, सिख, यहूदी, और ईसाई धर्मों के लोग यहाँ बसे हुए थे, लेकिन तालिबान शासन और गृह युद्ध के बाद अधिकतर लोग पलायन कर चुके है। अब इनकी कुल जनसंख्या में हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है। सालों के संघर्ष में लगभग 50,000 हिंदू और सिख लोग शरण के लिए दूसरे देशों में विस्थापित हो गए है।"

                     नागरिकता संशोधन विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित होने बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से एक कानून बन गया है। अब पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के धार्मिक प्रताड़ित अल्पसंख्यक भारतीय नागरिकता हासिल कर सकते है। हालाँकि, यह सुविधा कानूनी तौर पर पहले से ही मौजूद थी लेकिन उसमें अड़चने अधिक थीं। अब वर्तमान केंद्र सरकार ने उन्हें नागरिकता देने की प्रक्रिया को सरल बना दिया है। इस कानून की जरूरत पिछले कई सालों से महसूस की जा रही थी। यह एक मानवाधिकार संबंधी मामला था। विश्व भर के नेता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी इन तीन देशों में गैर-मुसलमानों के उत्पीड़न पर चिंता व्यक्त कर चुकी हैं।

                     संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश विभाग ने 2007 में अफगानिस्तान पर इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें वहाँ के अल्पसंख्यक लोगों के लगातार विस्थापन पर चर्चा की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, “यहाँ मुश्किल से 3,000 हिन्दू और सिख रहते हैं। कुछ सालों पहले तक हिन्दू, सिख, यहूदी, और ईसाई धर्मों के लोग यहाँ बसे हुए थे, लेकिन तालिबान शासन और गृह युद्ध के बाद अधिकतर लोग पलायन कर चुके है। अब इनकी कुल जनसंख्या में हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है। सालों के संघर्ष में लगभग 50,000 हिंदू और सिख लोग शरण के लिए दूसरे देशों में विस्थापित हो गए हैं।”

                      द टेलीग्राफ’ के अनुसार अफगानिस्तान विश्व का सबसे असहिष्णु देश है। अखबार ने इस सूची में पाकिस्तान को अठारहवें स्थान पर रखा है। बांग्लादेश में भी गैर-मुसलमानों का जीवन दूभर हो चुका है। इन देशों में अल्पसंख्यकों की जमीनों पर जबरन कब्जा, हमला, अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन, मंदिर तोड़ना, बलात्कार और हत्या एवं नरसंहार जैसी घटनाएँ सामने आती रहती हैं। इसका कारण सरकारों का अलोकतांत्रिक रवैया और न्यायिक प्रक्रिया का कमजोर होना है। पाकिस्तान में कई सालों तक तानाशाही रही जबकि अफगानिस्तान ने लोकतंत्र देखा ही नही है। दूसरा, इन देशों के संविधान से भी कई बार छेड़खानी हो चुकी है, जिसे कट्टर धार्मिक आकार दिया गया है। इसलिए इन देशों की पूरी व्यवस्था को धर्मतंत्र ने जकड़ लिया है।

                     पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश आधिकारिक तौर पर इस्लामिक देश है। यहाँ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्राध्यक्ष का मुसलमान होना जरूरी है। सभी अधिकारियों को इस्लाम के नियमों पर आधारित शपथ की बाध्यता है। राजनैतिक दल चरमपंथी उलेमाओं की सलाह के बिना एक कदम नही उठा सकते अथवा उनके खिलाफ नही जा सकते। अमेरिका के एक अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान पीआरसी ने 39 इस्लामिक देशों में एक सर्वेक्षण किया था। उन्होंने मुसलमानों से पूछा कि क्या वे अपने देश को शरियत कानून के अनुसार चलाना चाहते है? जवाब में अफगानिस्तान के सभी लोगों (99 प्रतिशत), पाकिस्तान के 84 प्रतिशत और बांग्लादेश में 82 प्रतिशत लोगों ने माना कि उनके यहाँ आधिकारिक कानून शरियत ही होना चाहिए।

                     एक अन्य सर्वेक्षण में जब पीआरसी ने सवाल किया कि ISIS के बारे में मुसलमानों का क्या सोचना है? इसके नतीजे भी चौकाने वाले थे। अधिकतर देशों ने हिंसा को जायज बताया जिसमें सबसे ज्यादा संख्या अफगानिस्तान में 39% थी। बांग्लादेश में ऐसे लोग 26 प्रतिशत और पाकिस्तान लगभग 13% थे। ISIS एक आतंकवादी संगठन है जोकि गैर-मुसलमानों के खिलाफ क्रूर हिंसा के लिए बदनाम है। यह आँकडें बताते है कि इन देशों में गैर-मुसलमानों का बहिष्कार किया जाता है, जिसे राजनैतिक समर्थन हासिल है।

                     ग्लोबल ह्यूमन राइट्स डिफेंस एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जोकि मानवाधिकारों के लिए कार्य करती है। इस संस्था ने 22 सितम्बर, 2018 को सयुंक्त राष्ट्र संघ के जिनेवा स्थित मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। जिसका उद्देश्य पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के उत्पीड़न पर अंतरराष्ट्रीय जागरूकता पैदा करनी थी। सैकड़ों शांतिपूर्ण लोगों ने इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। उन्होंने जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और दूसरी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को पाकिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर ध्यान देने की तत्काल आवश्यकता है।

                     अमेरिका की कॉन्ग्रेस के समक्ष भी यह मुद्दा कई बार उठाया जा चुका है। पिछले साल यानि 25 जुलाई, 2018 को कैलिफोर्निया से डेमोक्रेटिक सदस्य, एडम शिफ ने सदन में अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “मैं पाकिस्तान के सिंध प्रांत में मानवाधिकारों के हनन पर सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। सालों से, सिंध में राजनैतिक कार्यकर्ताओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रतिदिन जबरन धर्म परिवर्तन, सुरक्षा बलों द्वारा अपहरण और हत्या के खतरों का सामना करना पड़ता है।”

                     हवाई से अमेरिकी संसद की सदस्य और वहाँ राष्ट्रपति उम्मीदवार की दौड़ में शामिल, तुलसी गबार्ड भी 21 अप्रैल, 2016 को बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति का खुलासा कर चुकी है। उन्होंने सदन में कहा, “दुर्भाग्य से, बांग्लादेश में नास्तिक, धर्म निरपेक्षतावादियों, हिन्दू, बौद्ध, और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव और घातक हिंसा नियमित घटनाएँ हो चुकी हैं।”

                     पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न दशकों से हो रहा है। इसलिए, यह लोग भारत में शरण लेने को मजबूर हो गए। पाकिस्तान के सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबार ‘द डॉन’ ने 20 मार्च, 2015 को एक खबर के अनुसार, “पिछले साल पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों से जबरन धर्म परिवर्तन के 265 मामले सामने आए थे, और भारतीय दूतावास के पास विस्थापन के करीब 3,000 आवेदन लंबित है।

                     यह आँकड़ा आधिकारिक है लेकिन वास्तविक विस्थापितों की संख्या लाखों में है। एक सच्चाई यह भी है कि इन पीड़ितों को दुनिया के किसी भी देश में आश्रय नहीं मिल सकता, क्योंकि उन देशों के अपने कानूनी प्रतिबंध है। उनकी एकमात्र उम्मीद भारत से है क्योंकि इन तीन देशों के साथ हमारे ऐतिहासिक सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध रहे है। इसलिए, यह भारत की नैतिक जिम्मेदारी है कि इन विस्थापितों को सम्मान और गर्व के साथ जीवन जीने का अधिकार मिले, जिसके यह लोग हकदार हैं।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ