इस मंदिर में महिला पंडित कराती हैं पूजा, यहां दूर होते हैं रोग।


इस मंदिर में महिला पंडित कराती हैं पूजा, यहां दूर होते हैं रोग।
                   आज तक आप जब भी किसी मंदिर गए होंगे तो अपने वहां पुजारी तो देखे ही होंगे लेकिन क्या आपने कभी किसी मंदिर में पुरुष पुजारी की जगह महिला पुजारी को पूजा करते या प्रसाद बांटते देखा है? यकीनन ही इसका जवाब आप भी ना में ही देंगे। लेकिन आज हम आपको देश के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जहाँ पुरुष पुजारियों की जगह महिला पुजारियों ने मंदिर में पूजा-पाठ का ज़िम्मा उठाया हुआ है। यहाँ हम जिस मंदिर के बारे में बात कर रहे हैं वो बिहार के दरभंगा के कमतौल में स्थित अहिल्या माता का मंदिर है।

                   इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहाँ भगवान राम ने अहिल्‍या का उद्धार किया था इस मंदिर में हर साल रामनवमी के दिन एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है। इस दिन श्रद्धालु यहाँ सुबह से बैंगन का भार लेकर माता के मंदिर पहुँचते हैं और भगवान राम और अहिल्या के चरणों में बैंगन के भार को चढ़ाते हैं.

                   इस मंदिर के बारे में लोगों का मानना है कि जैसे गौतम ऋषि के श्राप से पत्थर बन चुकी अहिल्या का उद्धार उस वक़्त हुआ था जब त्रेता युग में भगवान राम ने उन्हें अपने चरण से स्पर्श किया था तभी उनके स्पर्श से पत्थर बनी अहिल्या में जान आ गई थी. ठीक इसी तरह जिस व्यक्ति के शरीर में अहिला रोग होता है, वो लोग अगर रामनवमी के दिन गौतम और अहिल्या स्थान कुण्ड में स्नान कर अपने कंधे पर बैंगन का भार लेकर मंदिर आते हैं और फिर बैंगन का भार देवी-देवताओं के चरणों चढ़ाते हैं उनके रोग भगवान अवश्य दूर करते हैं। ऐसा करने से उन्हें अहिला जैसे रोग से भी मुक्ति मिलती है.

                   क्या होता है अहिला रोग? अहिला इंसान के शरीर के किसी भी बाहरी हिस्से में हो जाता है और दिखने में ये एक मस्से की तरह नज़र आता है।

इस मंदिर में महिला पुजारी कराती हैं पूजा
                   आज भी इस जगह पर जहां भगवान राम ने अहिल्या का उद्धार किया था, वहां उसकी पीढ़ी अवस्थित है और इस मंदिर  की सबसे ख़ास बात है कि यहाँ पुरूष पंडितों की जगह महिला पुजारी ही पूजा कराती है. बताया जाता है कि इस जगह पर भारत के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ पड़ोसी देश नेपाल से भी हजारों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं. ये परंपरा यहाँ सदियों से चली आ रही है.

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