भगवान राम तथा माता सीता का भवन था - कनक भवन। - "अश्वमेध भारत"

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मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

भगवान राम तथा माता सीता का भवन था - कनक भवन।


माता सीता को मुंह-दिखाई में मिला था ये भवन, यहाँ आज भी आते हैं श्रीराम।
               धार्मिक कथाओं के अनुसार त्रेतायुग में महारानी कैकेयी ने श्री जानकी जी को मुंह दिखाई की रसम में कनक भवन को भेंट किया था। बाद में इसी भवन को श्री सीताराम जी ने अपने निजी निवास स्थान के रूप में अपनाया था। यहाँ आने वाले भक्तों और पुजारियों का ऐसा मानना है कि कनक भवन में आज भी भगवान राम और माता सीता वास करते हैं। इस मंदिर से जुड़े साधु-संत और श्री कनक बिहारी जी भगवान के प्रेमी उनकी दिव्य झांकी के दर्शन करने के लिए दिन में एक बार कनक भवन में अवश्य जाते हैं।

             यूँ तो भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में प्राचीन मंदिरों और सिद्ध स्थानों की कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी यहाँ कई ऐसे भवन और मंदिर हैं जिनका सीधा सम्बन्ध भगवान श्रीराम से रहा है।  ऐसे ही एक भवन के बारे में हम आज आपको बताने जा रहे हैं जिसे कनक भवन मंदिर के नाम से जाना जाता है। बेहद सुन्दर निर्माण शैली और मीलों दूर तक फैले विशाल प्रांगण में बना यह महल स्थापत्य कला का एक बेहतरीन उदाहरण है।

भगवान राम तथा माता सीता का भवन था - कनक भवन
             इस भवन के बारे में जो कथा प्रचलित है उसके अनुसार बताया जाता है कि कनक भवन भगवान राम के विवाह के बाद माता कैकई के द्वारा सीता जी को मुंह दिखाई में दिया गया था, जिसे भगवान राम और सीता जी ने अपना निजी भवन बना लिया था। उस समय का यह भवन चौदह कोस में फैली अयोध्‍या नगरी में स्थित सबसे दिव्‍य और भव्‍य महल हुआ करता था।

             बताया जाता है कि महारानी कैकेयी के अनुरोध पर अयोध्‍या के राजा दशरथ ने विश्वकर्मा की देखरेख में श्रेष्ठ शिल्पकारों के द्वारा कनक भवन का निर्माण कराया था। मान्‍यताओं के अनुसार, कनक भवन के किसी भी उप भवन में पुरुषों का प्रवेश वर्जित हुआ करता था। इस बात का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा लीजिए कि भगवान राम के परम भक्‍त हनुमान जी को भी बहुत अनुनय विनय करने के बाद इस भवन के आंगन में ही स्‍थान मिल पाया था। इसके अलावा कहा जाता है कि कनक भवन के गर्भ-गृह में भगवान श्रीराम-जानकी के अलावा किसी अन्य देवता का विग्रह स्थापित नहीं किया गया है।

कुश ने स्थापित की थी भगवान राम-माता सीता की मूर्तियां
             धार्मिक कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि कनक भवन का काफी बार जीर्णोद्धार कराया गया जिसमे त्रेता युग में भगवान राम के श्रीधाम जाने के बाद उनके पुत्र कुश ने कनक भवन में राम-सीता के मूर्तियां स्‍थ‍ापित कीं। हालाँकि जैसे-जैसे समय का चक्र घूमने लगा वैसे ही अयोध्या भी समाप्त होने लगा और उसी के साथ यह भवन भी जर्जर होने लग गया।

             प्राचीन समय की किताबों में इस भवन का जिक्र है। कहा जाता है कि इसी स्थान पर कनक भवन से विक्रमादित्‍य कालीन एक शिलालेख भी मिला था। उस शिलालेख में लिखा था कि जब कृष्ण जरासंध का वध करने के बाद प्रमुख तीर्थों की यात्रा करते हुए अयोध्या आए तो उन्होंने कनक भवन के एक टीले पर पद्मासना देवी को तपस्या करते हुए देखा। जिसके बाद ही उन्होंने उस टीले का जीर्णोद्धार करवाकर वहां मूर्तियां स्थापित कर दी थी।

ओरछा के राजा ने कराया वर्तमान कनक भवन का निर्माण
             जिस काल में माता कैकेयी ने अपनी माता सीता को यह भवन मुंह दिखाई में दिया था, वह त्रेता युग की बात बताई जाती है। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया यह भवन भी नष्ट होने लग गया। लेकिन शास्त्रों और प्राचीन धार्मिक इतिहास के आधार पर इसी स्थान को कनक भवन महल माना गया। बताया जाता है कि वर्तमान के कनक भवन का निर्माण ओरछा के राजा सवाई महेन्द्र प्रताप सिंह की पत्नी महारानी वृषभानु कुंवरि की देखरेख में कराया गया था।

आज भी कनक भवन में होता है भगवान का अहसास
             अयोध्या के प्राचीन कनक भवन का कितना महत्व है इस बात का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा लीजिए कि यहाँ आने वाले भक्त और संत मानते हैं कि आज भी भगवान श्री राम सीता माता के साथ इस परिसर में विचरण करने के लिए आते हैं। इस बात पर विश्वास करते हुए संत-जन और श्रद्धालु इस परिसर में आकर अपने आप को भगवान के एकदम पास अनुभव करते हैं।

             इस मंदिर परिसर में भगवान श्री राम का प्रकटोत्सव (प्रकट होने का उत्सव) बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है। इसके अलावा भगवान श्री राम को सजीव स्वरूप मानकर सावन में उन्हें झूला भी झुलाया जाता है। साल में पड़ने वाले कई त्यौहार जैसे अन्नकूट, दीपावली श्रीहनुमत-जयंती, महालक्ष्मी पूजन, और देव उत्थानी एकादशी आदि त्योहारों पर बड़ी ही आस्था, हर्ष और उल्लास के साथ मंदिर परिसर में लोग जश्न  मनाते हैं।

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