अपने आप में किसी चमत्कार से कम नहीं है चम्पावत का हिंगलादेवी मंदिर।


अपने आप में किसी चमत्कार से कम नहीं है चम्पावत का हिंगलादेवी मंदिर ।
              देवभूमि उत्तराखंड के चम्पावत जिले में पहाड़ों की चोटी पर स्थित हिंगलादेवी मंदिर सबसे प्राचीन एवं अनोखे मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर में श्रद्धालु देवी हिंगला की “माँ भवानी” के रूप में पूजा-अर्चना करते हैं। इस मंदिर की भव्यता एवं प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है, जहाँ से आप पूरे चम्पावत शहर के दर्शन कर सकते हैं।

इसी स्थान से माँ भगवती झूला झूलती थीं
               मान्यताओं अनुसार करीब डेढ़ साल दशक पहले तक हिंगलादेवी का ये अनोखा मंदिर एक छोटे से स्थान पर था जहाँ एक कुटिया भी बनी थी। जिसे बाद में एक भव्य मंदिर और कुटिया को छोटी सी धर्मशाला में बदल दिया गया। यहाँ के लोगों की माने तो हिंगलादेवी मंदिर के बारे में ये माना जाता है कि पौराणिक काल में इस स्थान से ही माँ भगवती अखिल तारणी चोटी तक झूला (हिंगोल) झूलती थी। जिसके बाद से ही इस पवित्र स्थान का नाम “हिंगलादेवी” पड़ा।

हर साल दुनिया भर के लोग करते हैं माता के दर्शन
                  माँ भवानी की पूजा में लोग परंपरागत तरीके से पशु बलि देते हैं, लेकिन हिंगलादेवी के रूप में यहाँ मौजूद माँ भवानी के पूजन में पशुओं की बलि निषिद्ध है। आज ये मंदिर देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी श्रद्धालुओं के बीच आस्था का मुख्य केंद्र बना हुआ है। यहाँ हर साल लाखों की संख्या में माँ के भक्त ऋद्धि-सिद्धि के साथ ही अपने दांपत्य जीवन की मनोकामना लेकर देवी के चरणों में हाज़िरी लगाने आते हैं, जिसे माँ पूरा भी करती हैं।

                मंदिर की भव्यता की बात करें तो इस मंदिर की शीला में दरवाजानुमा एक भव्य लेकिन प्राचीन आकृति बनी नज़र आती है, जिसको लेकर यहाँ के लोगों का मानना है कि इस बड़ी शीला के पीछे खजाना छिपा हुआ है। जिसकी चाबी मां हिंगलादेवी के पास है।

दर्शन से होता है पापों का अंत
               मंदिर में आने वाले लोगों की माने तो इस देवी पीठ के दर्शन और आराधना करने से इस जन्म में किये सभी पापों का अंत होता है, जिससे उन्हें मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि आज हिंगला सिद्धि को प्रदायक देवी के रूप में भी माना जाता हैं।

हिंगलादेवी मंदिर का रोचक इतिहास
              मुख्य शक्ति स्थल में शुमार हिंगलादेवी मंदिर की अलग ही पौराणिक मान्यता हैं। इस मंदिर का जिम्मा पुजारी चंद वंशीय राजा के कुलपुरोहित पर्वेत गाँव के पांडेय लोगों के पास है, जो कि सातवी सदी से पूर्व चंद राजा के साथ इस स्थान पर यहाँ आए थे और उन्हें व्यास गुरु के रूप में राजा द्वारा इस स्थान पर मान्यता दी गई थी। कहा जाता है कि उस समय एक दिन मंदिर के पुजारी को माँ हिंगला देवी ने सपने में दर्शन देते हुए जिले के पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर एक मंदिर का निर्माण कराने का आग्रह किया। जब पुजारी ने मंदिर निर्माण के लिए माता द्वारा बताई गई जगह पर निर्माण कार्य के लिए खुदाई कराई तो वहां देवी का शक्तिस्थल और उनके झूले के प्राचीन अवशेष मिले।

मंदिर निर्माण के दौरान जमीन से निकले माता के झूले के अवशेष
              देवी का शक्तिस्थल और झूले के अवशेष मिलने के बाद पुजारी और वहां के राजा ने उसी स्थान पर एक भव्य मंदिर की स्थापना कर, व्यास गुरु के भाई को पुजारी के रूप में नियुक्त किया। तभी से इस पवित्र स्थान को एक शक्तिस्थल के रूप में पूजा जाने लगा। कई लोगों का मानना तो ये भी है कि इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से भी पुराना है। चम्पावत जिले में हिंगलादेवी मंदिर के लिए आने वाले श्रद्धालु वहां के बालेश्वर मंदिर, क्रांतेश्वर महादेव मंदिर, पंचेश्वर महादेव मंदिर, आदित्य मंदिर, मानेश्वर मंदिर, नागनाथ मंदिर आदि मंदिरों के भी दर्शन करते हैं।

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