हम आरती तो गाते हैं "ॐ जय जगदीश हरे", पर क्या उसके रचयिता को भी जानते हैं ?


हम आरती तो गाते हैं "ॐ जय जगदीश हरे", पर क्या उसके रचयिता को भी जानते हैं ?

आरती, ॐ जय जगदीश हरे, पं. श्रद्धाराम शर्मा, श्रद्धाराम फिल्लौरी
                    शायद ही कोई हिन्दू घर हो, जिसमें भगवान विष्णू की आरती "ओम् जय जगदीश हरे" न गाई जाती हो। किन्तु हैरत की बात है कि अगर यह पूछा जाए कि इसके रचयिता कौन हैं, तो शायद अधिकाँश लोगों को ज्ञात नहीं होगा। मैंने भी यह सवाल जब अपने कुछ मित्रों से पूछा तो बड़े रोचक जबाब प्राप्त हुए - एक ने जवाब दिया कि यह आरती तो पौराणिक काल से गाई जाती है। एक ने कुछ ज्यादा ही दिमाग लगाया और कहा कि सम्भवत: इसके रचयिता अभिनेता-निर्माता-निर्देशक मनोज कुमार हैं, जिनकी फिल्म “पूरब और पश्चिम” में इसे स्व. महेंद्र कपूर ने गाया था। तो सचाई यही है कि "ओम् जय जगदीश हरे", आरती आज हर हिन्दू घर में न केवल गाई जाती है बल्कि इस आरती की तर्ज पर अन्य देवी देवताओं की भी कई आरतियाँ बन चुकी है, परंतु इस मूल आरती के रचयिता के बारे में काफी कम लोगों को पता है। आईये इस आरती के रचयिता पं. श्रद्धाराम शर्मा या श्रद्धाराम फिल्लौरी के जीवन वृत्त पर एक नजर डालें।
                    पं. श्रद्धाराम शर्मा का जन्म पंजाब के जिले जालंधर में स्थित फिल्लौर शहर में हुआ था। वे सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संगीतज्ञ तथा हिन्दी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। बचपन से ही उन्हें ज्यौतिष और साहित्य में गहरी रूचि थी। उनका पत्नी महताब कौर सिक्ख थीं। हैरत की बात यह है कि श्रद्धाराम जी कोई औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं की थी, परंतु उन्होंने सात साल की उम्र तक गुरुमुखी पढी और दस साल की उम्र तक वे संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी भाषाओं तथा ज्योतिष की विधा में पारंगत हो चुके थे। उन्होने पंजाबी (गुरूमुखी) में 'सिक्खां दे राज दी विथियाँ' और 'पंजाबी बातचीत' जैसी पुस्तकें लिखीं। 'सिक्खां दे राज दी विथियाँ' उनकी पहली पुस्तक थी. इस पुस्तक में उन्होनें सिख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे में बहुत सारगर्भित रूप से बताया था। यह पुस्तक लोगों के बीच इतनी लोकप्रिय और प्रसिद्ध हुई थी कि अंग्रेज सरकार ने भी तब होने वाली आईसीएस (जिसका भारतीय नाम अब आईएएस हो गया है) परीक्षा के कोर्स में इस पुस्तक को शामिल किया था।
                    पं. श्रद्धाराम शर्मा गुरूमुखी और पंजाबी के अच्छे जानकार थे और उन्होनें अपनी पहली पुस्तक गुरूमुखी में ही लिखी थी, परंतु वे मानते थे कि हिन्दी के माध्यम से ही अपनी बात को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाया जा सकता है। हिन्दी के जाने माने लेखक और साहित्यकार पं. रामचंद्र शुक्ल ने पं. श्रद्धाराम शर्मा और भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिन्दी के पहले दो लेखकों में माना है। उन्होनें १८७७ में भाग्यवती नामक एक उपन्यास लिखा था जो हिन्दी में था। माना जाता है कि यह हिन्दी का पहला उपन्यास है। इस उपन्यास का प्रकाशन १८८८ में हुआ था। दुर्भाग्य से इसके प्रकाशन से पहले ही पं. श्रद्धाराम का निधन हो गया। परंतु उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने काफी कष्ट सहन करके भी इस उपन्यास का प्रकाशन करवाया। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान पं. श्रद्धाराम शर्मा धार्मिक कथाओं और आख्यानों के माध्यम से अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जनजागरण का ऐसा वातावरण तैयार कर देते थे कि उनका आख्यान सुनकर प्रत्यैक व्यक्ति के भीतर देशभक्ति की भावना भर जाती थी। इससे अंग्रेज सरकार की नींद उड़ने लगी और उसने १८६५ में पं. श्रद्धाराम को न केवल फुल्लौरी से निष्कासित कर दिया गया, बल्कि आसपास के गाँवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। लेकिन उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकों का पठन विद्यालयों में जारी रहा। निष्कासन का उन पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि उनकी लोकप्रियता और बढ गई। निष्कासन के दौरान भी उन्होनें कई पुस्तकें लिखी।
                    पं. श्रद्धाराम ने अपने व्याख्यानों से लोगों में अंग्रेज सरकार के खिलाफ क्रांति की मशाल ही नहीं जलाई बल्कि साक्षरता के लिए भी ज़बर्दस्त काम किया। चर्चित आरती “ॐ जय जगदीश हरे” उन्होंने 1870 में लिखी। आरती के समापन बोल “विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, लोगों को आज भी नैतिकता और सदाचरण की शिक्षा देते हैं। पं. शर्मा सदैव प्रचार और आत्म प्रशंसा से दूर रहे, शायद यही कारण है कि उनकी आरती को चाव से गाने वाले लोग भी उनके जीवन और उनके कार्यों से परिचित नहीं हैं। 24 जून 1881 को लाहौर में पं. श्रद्धाराम शर्मा ने आखिरी सांस ली।

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