हितभरी बातों को ठुकराया तो विजय के बदले मौत को पाया


हितभरी बातों को ठुकराया तो विजय के बदले मौत को पाया

महाभारत के अंतर्गत हरिवंश पुराण में महर्षि वैशम्पायनजी जनमेजय को एक कथा सुनाते हैं-
                    वज्रनाभ नामक असुर ने तपस्या से ब्रह्माजी को प्रसन्न किया और देवताओं से अवध्य होने का वर माँगकर वज्रपुर में रहने लगा । एक बार वह देवलोक में जाकर इन्द्र से बोलाः “मैं तीनों लोकों पर शासन करना चाहता हूँ । देवगणेश्वर ! या तो मेरे लिए देवलोक खाली कर दो अथवा मुझसे युद्ध करो ।”

                    बुद्धिमान इन्द्र ने गुरु बृहस्पति जी से मार्गदर्शन पाकर कहाः “हम सबके पिता कश्यप मुनि यज्ञ की दीक्षा ले चुके हैं । उनका यज्ञ पूर्ण हो जाने पर वे जैसा उचित समझेंगे, वैसा हम लोगों के लिए निर्णय करेंगे ।”

                    वज्रनाभ ने कश्यपजी को सारा वृत्तान्त सुनाया तो उन्होंने भी यज्ञ समाप्ति तक रुकने के लिए कहा ।

                    एक ओर वज्रनाभ अपने नगर को चला गया । दूसरी ओर देवराज इन्द्र ने द्वारकापुरी जाकर भगवान श्रीकृष्ण को सारा वृत्तान्त सुनाया ।

                    श्रीकृष्ण ने नाट्यकला में प्रवीण भद्रनामा नट के साथ महाबली प्रद्युम्न और मुख्य-मुख्य यादवों को नट बनाकर देवताओं की कार्यसिद्धि के लिए वज्रपुर भेजा । उन सभी ने रामायण का सफल अभिनय करके सबको मोह लिया और राजमहल में रहने लगे तथा प्रद्युम्न वज्रनाभ की पुत्री प्रभावती के साथ गांधर्व विवाह करके वहाँ रहने लगा जिसका पता वज्रनाभ को नहीं था ।

                    यज्ञ समाप्त होते ही वज्रनाभ पुनः कश्यप जी के पास गया तो उन्होंने कहाः “वज्रनाभ ! इन्द्र तपस्या में तुमसे बड़े-चढ़े हैं, शक्तिशाली हैं । ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों के भक्त, कृतज्ञ, भाईयों में ज्येष्ठ और उत्तम गुणों की दृष्टि से श्रेष्ठ हैं । वे तीनों लोकों का राज्य पाकर समस्त प्राणियों के हित में तत्पर हैं । उन्हें जीतने के प्रयत्न से तुम स्वयं ही मारे जाओगे ।”

                    पर वज्रनाभ ने ब्रह्मवेत्ता सत्पुरुष कश्यपजी की हितभरी बातों को ठुकरा के त्रिभुवन-विजय का कार्य आरम्भ करने का विचार किया । इस सुअवसर की प्रतीक्षा करने वाले भगवान श्रीकृष्ण और देवराज इन्द्र दोनों ने वज्रनाभ वध के लिए प्रद्युम्न को संदेशा भेजा । प्रद्युम्न गर्भिणी प्रभावती आदि के लिए चिंतित थे तो भगवान श्रीकृष्ण और इन्द्र ने आश्वासन दिया कि ‘उन स्त्रियों से उत्पन्न होने वाले पुत्र उत्तम गुण युक्त, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, वेदज्ञ व भविष्यज्ञाता होंगे तथा जन्म लेने पर तत्काल ही तरुण हो जायेंगे ।’ कुछ समय बाद उन्हें पुत्रों की प्राप्ति हुई । एक दिन दानवों ने राजमहल की छत पर घूमते हुए प्रद्युम्न आदि यादव पुत्रों को देखा और जाकर वज्रनाभ को बताया । अपने घर को कलंकित करने वाला मानकर उसने उन सभी यादवकुमारों को मारने हेतु कैद करने के लिए असुरों को आज्ञा दी ।

                    महात्मा प्रद्युम्न ने प्रभावती को उसके पिता वज्रनाभ की परिस्थिति से अवगत कराया तो श्रेष्ठ मनस्वी नारी प्रभावती ने प्रद्युम्न के हाथ में तलवार देकर धर्मयुद्ध के लिए प्रेरित करते हुए कहाः “यदुनंदन ! शस्त्र उठाओ और अपनी रक्षा करो । दुर्वासा मुनि ने मुझे वर दिया है कि तू वैधव्यरहित, प्रसन्न एवं जीवित पुत्रों की माता होगी ।” यह वरदान प्रद्युम्न के लिए युद्ध में सुरक्षाकवच साबित हुआ ।

                    इन्द्र ने प्रद्युम्न की सहायता की । श्रीकृष्ण ने प्रद्युम्न को अपना वाहन गरुड़ तथा चक्र दिया । प्रद्युम्न ने देखते-ही-देखते चक्र से दैत्योंसहित देवद्रोही वज्रनाभ को मार डाला ।

                    वैशम्पायन जी कहते हैं- “जनमेजय ! व्यास जी का कथन है कि यह प्रसंग दीर्घायु प्रदान करने वाला एवं काम, क्रोध आदि शत्रुओं का नाशक है । इससे (इसको पढ़ने-सुनने से) पुत्रों और पौत्रों की वृद्धि होती है । आरोग्य तथा धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है एवं मनुष्य महान यश का भागी होता है ।”

                    अमरता और सुख जीवन की माँग है किंतु वज्रनाभ, हिरण्यकशिपु जैसे आसुरी प्रकृति के व्यक्ति शरीर को अमर बनाने का व्यर्थ प्रयास करके उसी को सत्ता का, भोगों का, सुख-सुविधाओं का नश्वर सुख दिलाकर सुखी होना चाहते हैं तो उनका वह प्रयास विफल ही हो जाता है । जो दैवी प्रकृति के हैं वे इन्द्र की तरह भगवान और संत-महापुरुषों का, सत्कर्म का आश्रय लेते हैं, लोकहित के दैवी कार्य करते हैं तो उन्हें सन्मति, सत्-सामर्थ्य की प्राप्ति हेतु है । ऐसे लोग ‘देव’ कहलाते हैं किंतु जो भगवत्प्रेमी, गुरुप्रेमी, निष्कामसेवी एवं सत्संगी होते हैं, वे देवत्व से भी आगे बढ़कर अर्जुन, राजा जनक, छत्रपति शिवाजी आदि की तरह महापुरुषों के वेदांत-वचनामृत का श्रवण, मनन, निदिध्यासन करते हैं और अपने आत्मस्वरूप का अनुसंधान करते हैं । वे अपने स्वरूप को जान के परम सुखरूप आत्मस्वरूप में विश्रांति पा के सच्चा एवं अमिट सुख प्राप्त करते हैं और वास्तव में अमर हो जाते हैं ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2019, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 321
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