नेपाल के चंगुनारायण मंदिर में श्राप मुक्त हुए थे भगवान विष्णु।



नेपाल के चंगुनारायण मंदिर में श्राप मुक्त हुए थे भगवान विष्णु।
                  धर्म और परंपराओं की देव भूमि माने जाने वाले भारत देश को अपने धार्मिक स्थलों, उनकी खूबसूरती और उनकी महत्ता के लिए विश्व भर में जाना जाता है, लेकिन भारत का पड़ोसी देश नेपाल भी इस मामले में भारत से पीछे नहीं है। नेपाल के बारे में कहा जाता है कि एक समय में वो देश विश्व का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र रह चुका है।  ऐसे में नेपाल में भी एक से बढ़ कर एक ऐसे मंदिर हैं जिनकी ख़ूबसूरती देखने लायक होती है। आज इस लेख में हम आपको नेपाल के जिस बेहद प्राचीन और खूबसूरत मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं वो है चंगुनारायण मंदिर।

                  बताया जाता है कि लिच्छवि सम्राट के शासनकाल में राजा हरि दत्त वर्मा ने नेपाल की ऊंची पहाड़ी की चोटी पर इस मंदिर का निर्माण करवाया था। ये मंदिर चंगु नाम के गांव में स्थित है और इसे 325 ईस्वी में बनाया गया था।  ये मंदिर चंपक के पेड़ो के घने जंगल से घिरा हुआ है। चौथी शताब्दी में बनाए गए इस मंदिर को भगवान विष्णु के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक गिना जाता है। हालाँकि साल 1702 में इस मंदिर को नेपाल की प्रसिद्ध पैगोडा शैली में दोबारा बनवाया गया था क्योंकि मंदिर में आग लग जाने के कारण इस मंदिर का पूरा नक़्शा उसमें जल के राख हो गया था।

विश्व-धरोहर की सूची में शामिल है ये मंदिर
                  इस मंदिर में क्षीर सागर में अपनी नागशैया पर लेटे भगवान विष्णु की एक बेहद ख़ूबसूरत और मन-मोह लेने वाली प्रतिमा स्थित है। चंगुनारायण मंदिर में विशाल प्रांगण है जिसमें रुद्राक्ष के पेड़ भी लगे हैं।  इसके अलावा इस मंदिर के बारे में सबसे अनोखी और दिलचस्प बात ये है कि इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व-धरोहर की सूची में शामिल किया हुआ है।

इस मंदिर के बारे में प्रचलित कहानी :
                  स्थानीय लोगों के बीच इस चंगु नारायण मंदिर के निर्माण से जुड़ी एक बेहद दिलचस्प कहानी बहुत प्रचलित है। इस कहानी के अनुसार बताया जाता है कि प्राचीन समय में एक ग्वाला हुआ करता था। ये ग्वाला एक बार सुदर्शन नाम के एक ब्राह्मण से एक गाय लेकर आया। ये गाय बहुत अधिक मात्रा में दूध देती थी। एक दिन ग्वाला अपनी गाय को चराने के लिए चंगु गांव में ले गया जहाँ घास चरते-चरते गाय एक पेड़ की छाँव में खड़ी हो गयी। शाम को जब ग्वाला गाय से दूध निकालने गया तब गाय ने बहुत काम दूध दिया।

                  ऐसा कई दिनों तक चला। गाय चरने के लिए चंगु गाँव जाती फिर कुछ समय के लिए वो पेड़ के नीचे खड़ी हो जाती थी और फिर वापिस आकर वो कम दूध देती। इस वजह से अब ग्वाला बहुत परेशान रहने लग गया। एक दिन जब उस ग्वाले से नहीं रहा गया तब वो उस ब्राह्मण के पास दोबारा पहुंचा और उससे सारी बातें बताई।  फिर ग्वाले और ब्राह्मण ने तय किया कि वो छुप कर देखेंगे कि आखिर गाय का दूध रोज़ जा कहाँ रहा है।

                  अब दोनों ने ठीक ऐसा ही किया और छुप कर देखने लगे लेकिन यहाँ उन्होंने जो देखा वो बेहद चौंकाने वाला था। दरअसल उन्होंने देखा कि एक बालक गाय के पास आया और उसने गाय का सारा दूध पी लिया। इस बात पर दोनों को बहुत गुस्सा आया। तब उन्होंने सोचा कि शायद ये बालक कोई शैतान हो और ये चंपक का पेड़ ही उसका घर हो, ऐसा सोचकर दोनों ने उस चंपक का पेड़ ही काट डाला। लेकिन ये क्या, उन्होंने जैसे ही चंपक का पेड़ काटा उस पेड़ से मानव-रक्त बहने लग गया। तब ग्वाले और ब्राह्मण को ऐसा लगा कि दोनों से किसी की हत्या हो गयी है और यही सोचकर दोनों ज़ोर-ज़ोर से रोने लग गए।

                  दोनों की ऐसी हालत देखकर भगवान विष्णु वहां अवतरित हुए और उन्होंने कहा कि, “आप दोनों चुप हो जाइये।  आपने कोई पाप नहीं किया है। बल्कि आपने तो स्वयं भगवान विष्णु को एक श्राप से मुक्ति दिलवाई है जो उन्हें तब लगा था जब गलती से उन्होंने सुदर्शन के पिता की हत्या कर दी थी।” भगवान विष्णु के मुख से ये बात सुनकर सुदर्शन और उस ग्वाले को यकीन हो गया कि उनसे किसी की हत्या नहीं हुई है। उसके बाद ही दोनों ने उस स्थान को पवित्र स्थान मानकर वहां पूजा करनी शुरू कर दी और कुछ समय बाद वहां एक मंदिर का निर्माण करवाया गया जिसे अब हम चंगु-नारायण मंदिर के नाम से जानते हैं।

                  कहा जाता है कि यही वजह है कि आज भी सुदर्शन नामक ब्राह्मण के वंशज इस मंदिर में पुजारी का काम करते हैं और उस ग्वाले के परिवार वाले इस स्थान की रक्षा करते हैं।

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