इस कारण के चलते हमेशा बाघ की खाल धारण करते हैं भगवान शिव ।


इस कारण के चलते हमेशा बाघ की खाल धारण करते हैं भगवान शिव
           भगवान शिव के गुस्से, उनके प्रेम-स्नेह, और उनकी अनगिनत महिमा की कहानियां तो आपने आजतक कई बार सुनी होगी लेकिन आज हम आपको भगवान शिव से जुड़ी एक ऐसी रोचक बात बताने जा रहे हैं जिसका ख्याल शायद ही आपके दिमाग में कभी आया होगा। ये सवाल है कि आखिर क्यों भगवान शिव वस्त्र के नाम पर बाघ की खाल पहनते हैं? वैसे बहुत से लोग शायद ही ये बात भी जानते हो कि भगवान शिव ने अपने शरीर पर जो कुछ भी धारण कर रखा है उसका भी एक खास महत्व होता है।

           शिव शंकर, भोलेनाथ हर समय अपने शरीर पर त्रिनेत्र, हाथ में डमरू और त्रिशूल, गले में सांप, और तन पर बाघ की खाल और गले में रुद्र धारण किये रहते हैं। सिर्फ धारण ही नहीं भगवान शिव बाघ की खाल पर ही विराजमान भी होते हैं और इस कारण के चलते ही उन्हें वाघम्बर भी कहते हैं। इसके अलावा हिन्दू ग्रन्थ में भगवान शिव द्वारा पहनी गयी बाघ की खाल का भी अपना ही एक महत्व बताया गया है। भगवान शिव आखिर क्यों बाघ की खाल पर बैठते और उसे धारण करते हैं इसका जवाब शिव पुराण में मिलता है।

इसलिए बाघ की खाल धारण करते हैं भगवान शिव?
           इस कथा के अनुसार जब श्री हरि विष्णु ने हिरणाकश्यप का वध करने के लिए नरसिंह का अवतार धारण किया था तब अपने इस रूप में वो आधे नर और आधे सिंह के रूप में नज़र आ रहे थे। बताया जाता है कि हिरणाकश्यप का वध करने के बाद नरसिंह अवतार के लिए श्री हरी हद से ज़्यादा क्रोधित हो उठे। यह सब देखकर शिव-शंकर ने अपने एक और अंश अवतार, वीरभद्र को उत्पन्न किया और उनसे नरसिंह देवता से निवेदन करने के लिए कहा कि वो अपना क्रोध छोड़ दें।

           हालाँकि जब गुस्से में तमतमाए नरसिंह भगवान नहीं मानें तब वीरभद्र ने शरभ का रूप धारण कर लिया। बताया जाता है की नरसिंह देवता को उस समय वश में करने के लिए वीरभद्र ने इंसान, गरुण और सिंह का रूप धारण कर लिया। इस रूप के चलते ही वो शरभ कहलाते हैं। पौराणिक कथाओं में इस बात का उल्लेख है कि तब शरभ ने गुस्से-गुस्से में भगवान नरसिंह को अपने पंजे से उठा कर उन पर अपनी चोंच से वार करना शुरू कर दिया। चोट से घायल नरसिंह ने अपने शरीर को त्यागने का फैसला कर लिया।

           उस समय अपने प्राण त्यागने से पहले भगवान नरसिंह ने शिव जी से निवेदन किया कि वो नरसिंह के चर्म (चमड़े) को स्वीकार करें। बताते हैं कि भगवान शिव ने नरसिंह भगवान के इस निवेदन को स्वीकार लिया और तबसे ही उन्होंने उस चर्म को अपना आसन बना लिया। माना जाता है कि उस दिन के बाद से ही भगवान शिव बाघ की खाल पर ही विराजने लगे और बाघ की खाल किसी ना किसी रूप में हमेशा उनके पास मौजूद रहती है।

भगवान शिव द्वारा धारण की गयी चीज़ों का महत्व
           शिखर पर चंद्रमा: भगवान शिव के शिखर पर लगे चंद्रमा इस बात का प्रतीक है कि, ‘ब्रह्मज्ञान मन के परे है, परन्तु उसे व्यक्त करने के लिये थोड़े मानस की आवश्यकता है।’

           हाथ में डमरू : भगवान शिव हाथ में जो डमरू लिए रहते हैं उसका अर्थ होता है ब्रह्माण्ड।

           गले में लिपटा सांप : भगवान शिव के गले में सदैव एक नाग लिपटा रहता है। ये नाग सजगता का प्रतीक होता है।

           हाथ में त्रिशूल : भगवान शिव के हाथ में एक त्रिशूल होता है जिसका अर्थ होता है, ‘वह जो सभी पीड़ा का अंत करे वह शिव के हाथ में है|’

           सिर से निकलती गंगा की धार : भगवान शिव के सिर से निकलती गंगा की धार ज्ञान का प्रतीक है।

           नंदी : शिव के नंदी को धर्म का प्रतीक माना जाता है। जब शिव जी खुद नंदी पर सवार होकर निकलते हैं तो उसका अर्थ होता है कि जब आप धर्म और सत्य की राह पर चलते हैं तो दिव्य अनंत चेतना और भोलेभाव वाली चेतना आपके साथ रहती है।

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