बॉलीवुड जगत की अशोभनीय धूर्तता।


बॉलीवुड जगत की अशोभनीय धूर्तता।
                     एक मध्यमवर्गीय आदमी अपने परिवार के साथ कभी-कभी वीकेंड पर थिएटर की ओर रुख करता है तो इस उद्देश्य से कि उसका परिवार के साथ अच्छा वक्त गुजरेगा, उसका परिवार मूवी देखकर प्रसन्न होगा, कुछ अच्छा लेकर वापस लौटेगा लेकिन जब मूवी प्रारंभ होती है तो कभी कॉमेडी के रूप में वह अपनी संस्कृति पर हंस रहा होता है (जैसे— पीके मूवी), तो कभी परिवार नामक संस्था का जमकर मजाक उड़ रहा होता है और वह उस पर हंसता है (जैसे— पति, पत्नी और वो), कभी हिंदू-मुसलमान को आपस में भड़काने वाला एजेंडा मिलता है (जैसे— कलंक) तो कभी लव जिहाद को खूबसूरत तरीके से परोसा जा रहा होता है (जैसे— केदारनाथ मूवी) कभी जब अत्याचार वाली मूवी बनती है तो उसमें भी विलेन साधु या कट्टर हिन्दू के रूप में दिखाया जा रहा होता है फिर वह तार्किक हो या न भी हो। विलन हिंदू होना चाहिए, कट्टर धार्मिक होना चाहिए बस इतना ही तार्किक है। एक भारतीय मुसलमान कभी देश को धोखा दे ही नहीं सकता(मूवी— कमांडो-3 ट्रेलर का डायलॉग), एक मुसलमान कैसा भी हो शराब को हाथ भी नहीं लगा सकता क्योंकि उसके लिए वह हराम है (सुपरहिट मूवी— वॉर) लेकिन आपको एक भी ऐसी मूवी देखने को नहीं मिली होगी जिसमें यह कहा गया हो कि— एक हिंदू कभी कट्टर नहीं हो सकता।

                     हिंदुओं के लिए बॉलीवुड में एक ही प्रिय चरित्र है और वह है विलेन। विलेन भी ऐसा-वैसा नहीं, सदैव ब्राह्मण (आर्टिकल 15, केदारनाथ, मदर इंडिया) अथवा ठाकुर/ऊंची जाति क्षत्रिय (अनगिनत फिल्में जैसे कलंक) और ब्राह्मण/ठाकुर केवल विलेन ही नहीं दिखाए जाते बल्कि विशुद्ध धार्मिक प्रतीकों के साथ दिखाए जाते हैं। वो कभी तो आरती करते हुए, जय माता दी के नाम की पट्टी लगाए हुए (दबंग-3 ट्रेलर) अथवा कभी त्रिपुंड माथे पर लगाए हुए, कभी साधु-संतों के भेष में। किसी भी मूवी में आपको यह डायलॉग नहीं मिलेगा, जैसे एक सच्चा ब्राह्मण कभी धन का लालची नहीं होता या एक सच्चा ब्राह्मण कभी शराब को हाथ नहीं लगाता या एक सच्चा ठाकुर सदैव अपने गांव के गरीबों की रक्षा करता है (एक-आध अपवाद स्वरूप फ्लॉप मूवी को छोड़कर) या एक हिन्दू कभी लोगों पर अत्याचार नहीं करता। एक हिंदू ब्राह्मण लड़की को शराब पीता हुआ दिखाया जाता है (तनु वेड्स मनु)।

                     हाल ही में एक मूवी आने वाली है, नाम है मरजावां। दो ट्रेलर आ चुके हैं। कहानी एकदम स्पष्ट है। एक गुंडा होता है हिंदू, उसे प्रेम होता है जोया से, जब जोया उसे कुरान की आयतों वाला माऊथ ऑर्गन (विशेष हाइलाइट) देती है तो उसके दिल में मोहब्बत का संचार होता है (तात्पर्य— सेक्यूलर लोग), लेकिन शायद उसका बॉस सबसे बड़ा आतंकवादी टाइप विलेन, जिसका नाम विष्णु है ( यहां विष्णु को जान-बूझकर टारगेट किया गया है) वह दो प्रेम करने वालों को आपस में मिलते नहीं देता। गौरतलब बात यह है कि विलेन विष्णु का कद भी तीन फुट है ( भगवान विष्णु का वामनावतार) जिसका कोई तर्क नहीं।

                     यह कर रहा है हमारा बॉलीवुड। जिसमें हिंदुओं को कट्टर, आतंकवादी, गुंडा, लंपट, बलात्कारी, चरित्रहीन सब बताया जा रहा है। अंत में जब एक आदमी मूवी देख के थिएटर से बाहर आता है तो एक ही निष्कर्ष निकालता है कि हिंदू जिसमें ब्राह्मण और सवर्ण जातियां सदैव अत्याचारी रही हैं।

                     हिंदुओं को बांटने का यह खेल आजादी के बाद से ही मनमोहक रूपों में, कर्णप्रिय संगीत के साथ देश में खुलेआम परोसा जा रहा है, और स्वभाव से सरल हृदय हिंदू अपनी बुराई स्वीकारता आ रहा है। उनके प्रतीक इतने मनमोहक और भ्रामक हैं कि आप उन पर शक नहीं कर सकते। क्या फिल्में बगैर नफ़रत फैलाए नहीं बनाईं जा सकती। बिल्कुल बनाईं जा सकती हैं। आप बाहुबली या केजीएफ देख लीजिए। आपको नफरत नहीं मिलेगी। भारत में सिर्फ साउथ से उम्मीद है। आप हॉलीवुड की मूवीज देखिए, उनमें बिल्कुल भी ईसाई या मुस्लिमों की टकराहट हाइलाइट नहीं की जाती। बिना धार्मिक टकराहट दिखाए भी उद्देश्य पूर्ण फिल्में बनाईं जा सकती हैं लेकिन बनाई नहीं जाती। बॉलीवुड की यह धूर्तता असहनीय होती जा रही है। अब तो सीधा टारगेट करती फिल्में बन रही हैं। यह एक गंभीर मुद्दा है इस पर हमें विचार करना चाहिए। आखिर एक आदमी मनोरंजन के उद्देश्य से थिएटर जाता है और वहां उसे एजेंडा परोसा जाता है मतलब उसी के पैसे से उसी के विचारों को गाली। यह अनुचित है। विचार कीजिए।

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