एक किला जिसकी छत ज़मीन के अंदर धसी हुई है और आधार आसमान की ऒर देख रहा है!! क्या उल्टा किला वास्तव में उल्टा है या फिर यह हमरा भ्रम है? - "अश्वमेध भारत"

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शनिवार, 30 नवंबर 2019

एक किला जिसकी छत ज़मीन के अंदर धसी हुई है और आधार आसमान की ऒर देख रहा है!! क्या उल्टा किला वास्तव में उल्टा है या फिर यह हमरा भ्रम है?


एक किला जिसकी छत ज़मीन के अंदर धसी हुई है और आधार आसमान की ऒर देख रहा है!! क्या उल्टा किला वास्तव में उल्टा है या फिर यह हमरा भ्रम है?

              भारत में ऐसे कई मंदिर और स्मारक हैं जो वास्तुकला और विज्ञान के अद्भुत समागम द्वारा बनाई गयी है। इनमें से कुछ मंदिर और स्मारक तो त्रेतायुग और द्वापरयुग से संबंधित है। आश्चर्य की बात यह है कि हज़ारों वर्ष पूर्व किस तकनीक के माध्यम से हमारे पूर्वजों ने आधुनिक विज्ञान को अचंबित कर देने वाले स्मारक बनाये होगेंअब उत्तराखंड के उधमपुर जिले के काशीपुर में स्थित किले को ही देख लीजिए। इस किले को देखने से आपको लगता है कि इसका छत ज़मीन के अंदर धस गया हो और इसका आधार आसमान की ऒर देख रहा हो।

              भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्था ने इस जगह पर खुदाई की है। जितनी खुदाई की गयी है उससे इतना पता चला है कि यह किला उल्टा है। किले की ऊपरी तरफ़ कॊई खिड़की या दरवाजा नहीं है। किले के अंदर किस तरह प्रवेश किया जाता था यह किसी को पता नहीं। किंवंदंतियों के अनुसार यह किला पांडवों द्वारा बनाया गया था। गुरु द्रॊणाचार्य पांडवों को शिक्षा-दीक्षा इसी किले के अंदर दिया करते थे। इस किले के पास एक बड़ा तालाब है जिसे द्रॊण सागर कहा जाता है। माना जाता है इसके अंदर सात कुएं हैं।

क्या उल्टा किला को श्राप मिला थाया प्राकृतिक विकॊप के समय किला उल्टा हुआ था।

              लगता तो नहीं। अगर हम हमारे पुराणॊं को ठीक से पढ़ेगे तो हमें दो नाम सुनने को मिलता है। एक है ‘मया’ और दूसरे हैं ‘विश्वकर्मा’। जब भी भारत की वास्तुकला की बात होती है तब मया नामक असुरों की और विश्वकर्मा की बात आती है। इनकी अद्भुत वास्तुकला के चर्चे हमारे पुराणॊ में बार बार हुए है। इंद्र की अमरावती होस्वर्ण लंका होकृष्ण की द्वारका होपांडवों का इंद्रप्रस्त हो इन सभी का निर्माण अलौकिक शक्तियों वाले मया या फिर विश्वकर्मा द्वारा किया गया था।
              अगर उल्टा किला पांडवो ने बनवाया था तो निश्चित ही मया द्वारा ही बनवाया गया होगा। इस किले को कुछ इस प्रकार बनवाया  गया होगा तांकि शत्रुओं से खुद को छुपाया जा सके। शत्रुओं को भ्रमित करने के लिए इस किले का जमीन के अंदर से आसमान की ऒर निर्माण किया गया होगा। हो सकता है जमीन के अंदर भूमिगत कक्ष और सुरंग मार्ग भी हो तांकि किसी गुप्त जगह पर आवागमन किया जा सके। अगर आप को याद होगा तो कौरवों ने पांडवों की हत्या करने के लिए मोम का महल बनवाया था जो सूरज की रॊशनी पड़ते ही पिघल जाता था! ऐसे महल तो केवल मया ही बना सकते थे।

पांडवों की पाठशाला?
              गुरु द्रॊणाचार्य ने पांडवों को किसी गुप्त जगह पर ही शिक्षा दी होगी तांकि जो शिक्षा पांडवों को मिली है वो अन्य किसी को ना मिले। इसलिए मया द्वारा एक ऐसे भवन का निर्माण किया गया होगा जिस के अंदर केवल और केवल पांडव और उनके गुरू जा सकते थे। हो सकता है यह किला बाहर से पूरी तरह बंद था और इसका द्वार भूमी के अंदर था। या फिर कॊई ऐसी तकनीक थी जिसका ज्ञान केवल पांडवों और गुरू द्रॊणाचार्य के पास था। अगर इन्द्रप्रस्त की मय सभा का उल्लेख देखा जाये तो वह सभा इस तरह बनाई गयी थी कि उसके अंदर जाने वाले पानी को जमीन और जमीन को पानी समझकर भ्रमित हो जाता था!

              तात्पर्य यह है कि मया और विश्वकर्मा के पास ऐसी कॊई न कॊई तकनीक थी जिससे वे ऐसे स्मारक रातो रात बना देते थे जिसका रहस्य एक सामान्य मनुष्य जान ही नहीं पाया। हम केवल अनुमान ही लगा सकते हैं क्यों कि अभी भी इस किले की पूरी तरह से खुदाई नहीं हुई है। जैसे जैसे खुदाई गहरी होती जायेगी या तो इन रहस्यों से परदा उठ जायेगा या फिर ये रहस्य और भी गहरे होते जायेंगे और हम इन रहस्यों में उलझ जायेंगे किंतू रहस्य नहीं सुलझेगा। सनातन धर्म इसीलिए तो महान है कि आज तक इसका रहस्य कॊई बेध ही नहीं पाया।

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