ओरछा के इस मंदिर में विराजे हैं अयोध्या राम मंदिर के प्रभु श्रीराम। - "अश्वमेध भारत"

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गुरुवार, 28 नवंबर 2019

ओरछा के इस मंदिर में विराजे हैं अयोध्या राम मंदिर के प्रभु श्रीराम।

ओरछा के इस मंदिर में विराजे हैं अयोध्या राम मंदिर के प्रभु श्रीराम
                    अयोध्या राम जन्म भूमि में पांच सौ से भी अधिक साल से चले आ रहे विवाद को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले के बाद हल कर दिया है।  कोर्ट ने अपने इस फैसले से विवादित भूमि श्रीराम जन्मभूमि न्यास को सौंप दी है और साथ-ही-साथ सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद के निर्माण के लिए अयोध्या में ही पांच एकड़ ज़मीन देने का भी निर्णय सुनाया है। प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि से अब तक कई ऐसे सबूत मिल चुके हैं जो इस बात की तरफ साफ़ इशारा करते हैं कि ये स्थान हमेशा से ही भगवान श्रीराम का रहा है।

ओरछा के इस मंदिर में विराजमान है श्रीराम की प्रतिमा
                  जहाँ एक तरफ अयोध्या में आज भी भगवान श्रीराम की बाल लीलाओं की जीवंत यादें मौजूद हैं वहीँ शायद आपको जानकर हैरानी हो कि अयोध्या के राम मंदिर की मूल प्रतिमा अयोध्या में नहीं बल्कि ओरछा के एक मंदिर में स्थापित है। अब आप सोच रहे होंगे कि भगवान राम की मूल प्रतिमा ओरछा कैसे पहुंची? तो हम आपको बता दें कि अयोध्या और ओरछा का नाता तकरीबन 600 साल पुराना है। 

रामराजा मंदिर में विराजमान है भगवान राम की प्रतिमा?
                  पुराने समय की कहानियों के अनुसार कहा जाता है कि उज्जैन के राजा महाराजा विक्रमादित्य ने अयोध्या में राम जन्म भूमि पर मंदिर का निर्माण कर प्रभु श्रीराम की प्रतिमा की स्थापना की थी. बताया तो ये भी जाता है कि जिस वक़्त सन 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने राम मंदिर का विध्वंस किया था उस समय ओरछा की महारानी भगवान श्रीराम की इस मूर्ति को लेकर वहां से चली गई थी.

                 उस समय से लेकर आजतक भगवान श्रीराम की वो मूर्ति ओरछा के मंदिर में आज भी स्थापित है। वर्तमान में राम जन्मभूमि पर श्रीराम वह मूर्ति विराजमान है जो 22 दिसंबर 1949 को रखी गई थी। कुछ पौराणिक कथाओं में इस बात का ज़िक्र है कि ओरछा के राजा मधुकरशाह बहुत बड़े कृष्ण भक्त थे और वहीँ उनकी रानी कुँवर गणेश राम भक्त थीं।  यही बात दोनों के बीच कई बार विवाद का कारण भी बन जाया करती थी। ऐसे में एक बार राजा मधुकर ने अपनी रानी से वृन्दावन जाने की बात कही लेकिन रानी ने उसे विनम्रतापूर्वक मना करते हुए अयोध्या जाने की ठान ली।

                    इस बात से क्रोधित राजा ने रानी को व्यंग्य भरे लहज़े में कहा कि अगर तुम इतनी ही बड़ी राम भक्त हो तो अपने प्रभु श्रीराम को अयोध्या से ओरछा लाकर दिखाओ।  राजा द्वारा अपने आराध्य के प्रति ऐसी बात सुनकर रानी इतनी आहत हुईं कि उन्होंने अयोध्या जाने का फैसला कर लिया। अयोध्या जाकर रानी ने लगातार 21 दिनों तक भगवान राम की स्तुति की और उन्हें अपने पास आने को कहा।  हालाँकि जब ऐसा नहीं हुआ तो इस बात से आहत रानी ने सरयू नदी में छलांग लगा दी। अपने प्रति रानी की ऐसी श्रद्धा देखकर भगवान श्रीराम सरयू नदी के जल में ही उनकी गोद में आ गए।

भगवान श्रीराम ने रानी के सामने रखी तीन शर्तें
                    भगवान श्रीराम को अपने समक्ष देखकर रानी ने उनसे आग्रह किया कि वो उनके साथ ओरछा चलें।  हालाँकि इस बात को पूरा करने से पहले भगवान श्रीराम ने रानी के समक्ष तीन शर्तें रखीं। भगवान राम की पहली शर्त थी कि “मैं यहाँ से जाकर जहाँ बैठ जाऊंगा वहां से मैं कभी भी उठूंगा नहीं” , दूसरी शर्त थी कि, “मेरे ओरछा चलने के बाद वहां कोई और राजा नहीं रहेगा, क्योंकि मैं वहां राजा के रूप में विराजित हो जाऊंगा” और प्रभु श्रीराम की तीसरी और आखिरी शर्त थी कि  “वह अयोध्या से बाल्यावस्था में साधु- संतों के साथ पैदल पुष्य नक्षत्र ले जाएंगे।”

                   रानी भगवान श्रीराम को किसी भी कीमत पर ओरछा ले जाना चाहती थीं ऐसे में उन्होंने भगवान राम की तीनों शर्तें मान ली।  रानी द्वारा शर्त पूरी होने के बाद प्रभु राम उनके साथ ओरछा आ गए. रामराजा मंदिर में लिखा दोहा आज भी भगवान श्रीराम के ओरछा और अयोध्या दोनों ही स्थानों पर होने का प्रमाण देता है। 

महल की रसोई में मौजूद है भगवान श्रीराम की प्रतिमा
                    पौराणिक कथाओं के अनुसार जब अयोध्या से भगवान राम की मूर्ति को ओरछा लाया गया तो मंदिर में स्थापित करने से पहले मूर्ति को महल की रसोई में रखा गया। हालाँकि जब मूर्ति को मंदिर में स्थापित करने के लिए उठाने की कोशिश की गई तो मूर्ति नहीं हिली। आखिरकार हार कर महल की रसोई में मूर्ति को स्थापित कर उसको राम राजा का महल नाम दे दिया गया।

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