प्रदूषण का आपातकाल या मानसिक दिवालियेपन का आपातकाल। - "अश्वमेध भारत"

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रविवार, 10 नवंबर 2019

प्रदूषण का आपातकाल या मानसिक दिवालियेपन का आपातकाल।

प्रदूषण का आपातकाल या मानसिक दिवालियेपन का आपातकाल।

                           प्रकृति को जो समझ पाया है वही जी पाया है। पशु पक्षी जलचर थलचर आदि सब प्रकृति के अनुरूप अपना जीवन जीते हैं। मनुष्य ने अपनी सुख सुविधाओं हेतु जो नवीन सुलभताओं का निर्माण किया तो अब प्राकृतिक शैली से दूर होने की हानि भी उठानी ही पड़ेगी। कर्म जो किया तो फल भी भोगना पड़ेगा। सूर्य इस समय दक्षिणायन है। पृथ्वी 23.5° झुकी हुई है । सूर्य उत्तरायण के समय सूर्य की किरणें अधिक ताप देती हैं क्योंकि झुकाव सूर्य की और होता है, जिससे जल स्रोतों का वाष्पीकरण नियमित रूप से होता रहता है । जल सूक्ष्म रूप में जब बादलों के बनने की प्रक्रिया के समय ऊपर उठता है तो प्रदूषित वायुमण्डल की सफाई करता हुआ ऊपर पहुँचता है। फिर बरसता है।
                         अब इस समय सूर्य दक्षिणायन है, सूर्य की किरणें सीधी नही पहुँचती अतः सूर्य का ताप भी कम ही रहता है जिससे जलीय स्रोतों का वाष्पीकरण नही होता, जल सूक्ष्म रूप से ऊपर नही उठता, जिसनकार्न वायुमण्डल की सफाई भी नही हो पाती।
                        अब मोमबत्ती intellectuals का कहर बरप रहा है इस समय, अवसर अनुकूल है और पर्वों का मास है यह। रात 8-9 बजे से 2 बजे तक हुए पटाखों को इस प्रदूषण का कारण बताया रहे कुबुद्धिजीवियों के मानसिक प्रदूषण के कुतर्क देख देख कर दया के भाव उमड़ते हैं... कभी कभी दया भी क्रूर हो जाती है।
                       कल twitter पर लॉस एंजेल्स, मेक्सिको, चीन, अल्मेट्टी आदि शहरों के satellite चित्र मिले जिससे स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि इन शहरों के ऊपर भी वायुमण्डलीय कचरा जमा है। अब ये मोमबत्ती intellectuals कृपया बताएं कि क्या इन शहरों में भी दीपावली मनाई गई और पटाखे फोड़ने से यह प्रदूषित कचरा इतने बड़े स्तर पर इकठ्ठा हुआ? या इन शघरों में भी पड़ोसी राज्य से खेती के बाद पराली जलाने से कचरा जमा हो रहा है


                         मौसम विभाग और पर्यावरण विभाग के बयानों का अध्ययन किया जाये तो पंजाब आदि राज्यों में जो परली जलाई जा रही है उसका धुआं भी मात्र 20% है तो बाकी कचरा तो फिर फैक्ट्रियों और वाहनों का ही हो सकता है। उमसे भी वाहनों का सबसे अधिक माना जाए। प्रकृति को न समझना आत्महत्या ही समझा जाना चाहिए।

                   कल तक जो Ideot-Actuals पटाखों को कारण बता रहे थे वो लोग दिवाली से लेकर आज तक लगातार गाड़ियों के धुएं फूंक फूंक कर आतिशबाजी करते हुए प्रदूषण फैला रहे हैं परंतु इस तथ्य को यदि उनके सामने रख दो तो कुतर्क-चालीसा आरंभ हो जायेगा।
राम भली करे इन लिखे पढ़े intellectuals की।
                     एक बहुत बड़े न्यायाधीश हुए भारत में जो NGT - National Green Tribunal के चीफ बनाये गए। इन मूर्खाधीश अर्थात न्यायाधीश ने गोबर के उपलों को प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण मानते हुए कई क्षेत्रों में गोबर के फैलाव और गोबर के उपलों पर प्रतिबंध लगवा दिया था।

अब आप भी समझदार हैं...
                   स्पष्ट समझ सकते हैं आप ...कि क्या होगा उस समाज का जिस समाज का प्रतिनिधित्व, नेतृत्व, मार्गदर्शन ऐसे कुबुद्धिजीवी करेंगे तो?

समाधान
                      प्रकृति ने एक मार्ग बंद किया तो ऐसा नही कि सभी मार्ग बंद हो गए। वास्तविकता तो यह है कि मार्ग हमने स्वयं बंद किये हैं। पीपल लगाने आपने बंद के दिए। बल्कि पीपल उखाड़ उखाड़ कर कूड़े में फेंक दिए। नीम के स्थान पर ढाक के पेड़ लगाने लगे। घर के गमले में भी सुंदर सुन्दर अशोक के पेड़ लगाएंगे लेकिन ऑक्सीजन जन्य वृक्ष उखाड़ कर फेकेंगे। यज्ञ, हवन आदि करने हमने ही बंद किये।

अब लीजिये समाधान
यदि सूर्य जी किरणों से ताप नही उत्पन्न हो रहा तो यज्ञ की अग्नि से ताप उत्पन्न कीजिये। यज्ञ की आहूति हेतु जो हवन सामग्री है उसके साथ में चावल और देशी गाय के गोबर की आहूति दीजिये...

चावल क्या है?
                      चावल पानी की एक ठोस अवस्था है जो अग्नि के ताप से द्रवित होकर वाष्पीकरण की process में बदलती है। अब क्या आप अपने आसपास के लोगों को साथ लेकर हवन आदि के कार्य को आरम्भ करेंगे। कुल 300-500 रूपये का खर्च है एक हवन का। हवन कीजिये और अपने आसपास के वातावरण को शुद्ध कीजिये, पड़ोसी के लिए न भी करो तो कम से कम अपने परिवार के लिए ही कर लीजिए।

सच मानिये
इस वैदिक विज्ञान के आगे पश्चिम का विज्ञान पस्त है पूर्ण रूपेण।
                    2014 में जर्मनी के एक पर्यावरण विशेषज्ञ दल डेरा हवाई जहाज और हेलीकाप्टरों से जल छिड़काव का प्रस्ताव रखा गया था जो कि अत्यधिक खर्चीला होने के कारण खारिज कर दिया गया।

बाकी सरकारों के भरोसे रहेंगे...
                तो वहाँ कोई नहीं जो हवन आदि के संचालन की बात कर सके क्योंकि उमसे से सबको वैदिक संस्कृति की बदबू आती है। मूर्खता की हद तो तब हो गई जब आज न्यूज़ चैनल्स पर देखा कि केजरीवाल सरकार सड़कों पर पानी का छिड़काव कर रही है ।

जिनके दिमाग में कीचड़ भरा होगा
वो हरामखोर सड़कों पर भी कीचड़ ही फैलाएंगे।



लवी भरद्वाज सावरकर

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