चंबल नदी के पास स्थित चतुर्भुज नला साइट के चट्टानों में दस हज़ार साल पुरानी चित्रों से शतरंज खेल की और पहिये के उपयॊग किये जाने का साक्ष्य!! - "अश्वमेध भारत"

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शनिवार, 30 नवंबर 2019

चंबल नदी के पास स्थित चतुर्भुज नला साइट के चट्टानों में दस हज़ार साल पुरानी चित्रों से शतरंज खेल की और पहिये के उपयॊग किये जाने का साक्ष्य!!





चंबल नदी के पास स्थित चतुर्भुज नला साइट के चट्टानों में दस हज़ार साल पुरानी चित्रों से शतरंज खेल की और पहिये के उपयॊग किये जाने का साक्ष्य!!

              भारत के लोग बुद्धिमत्ता में बहुत ही आगे थे। इसीलिए उन्हें आर्य कहा जाता था। आर्य यानी ज्ञानी। आर्यावर्त यानी ज्ञनियों का निवास स्थान। भारत के चंबल नदी के पास स्थित चट्टानों के अंदर इस बात के साक्ष्य मिले हैं कि हज़ारों साल से ही हमारे पूर्वज चौपद (जिसे आम भाषा में हम शतरंज का खेल कहते हैं) खेलना जानते थे। इन चट्टानों पर चौसर या दस पच्चीसी के और पहिए के चित्र बनाये गये हैं जो लगभग दस हज़ार साल पुराने हैं।
              चतुर्भुज नला साइट पर दुनिया की सबसे लंबी चट्टान कला की श्रृंखला है। RASI के सचिव जी.एल.बदाम जो एक जाने माने जीवाश्म विज्ञानी हैंइनके अनुसार दुनिया में चित्रकला की इतनी लंबी श्रृंखला और कहीं नहीं हैं। यह बहुत पुरानी होने के बावजूद आज भी सुस्थिती में है। इस साइट की डेंटींग से पता चलता है कि यह हज़ारों साल पुराना है। लाल रंग के इन चित्रकलाओं में पशुज्यामितीय डिजायिनप्रकृती और लोगों के दिनचर्या से जुड़े चित्र बनाये गये हैं।
              ब्राडशाव फौंडॆशन के अनुसार यह चित्रकला दस हज़ार वर्ष पुराने हैं और मध्य पाषाण युग के हैं। इन चित्रों में शैलीगत और विषयगत अंतर देखने को मिलते हैं। इनके शैलिगत निर्माण को ध्यान में रखते हुए इन्हें पाषाण युग का आरंभनिम्न पाषाण युगमद्य पाषाण युग और ताम्र युग जैसे विभिन्न काल में विभाजित किया गया है। यानी पाषाण युग के प्रारंभ (12000) से ताम्र युग (4000) के बीच में इन चित्रकलाओं को बनाया गया होगा।
              यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि हज़ारों साल पूर्व से ही भारत के लॊग चौपार या शतरंज खेलना भी जानते थे और चित्रकला में भी माहिर थे। निस्संदेह आर्यावर्त के लोग शतरंज जैसे अत्याधिक जटिल और कुशल खेल को खेलना जानते थे। द्वापर युग में शतरंज का खेल खेलना आम बात थी। इसी शतरंज खेल के लत के कारण युधिष्टिर ने अपना साम्राज्य ही नहीं बल्की द्रौपदी को भी दाव पर लगाकर खेल में सब कुछ हार गये थे।
              भारत के लोग रथजहाजविमान और अन्य उपकरण बनाने की विद्या भी जानते थे। इसका अर्थ यही होता है कि हमारे पूर्वज दुनिया के सबसे पहले और सबसे बुद्दिमान जनांग थे। भारत के लोगों ने ही दुनिया के अलग अलग छॊर पर जाकर अन्य जनांगों का निर्माण किया था। हमारे वेद जिस बात को कहते हैंअब इस बात की पुष्टी विज्ञान भी कर रहा है।

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