लोहड़ी अपना ऐतिहासिक महत्व खोता एक हिन्दू त्यौहार। - "अश्वमेध भारत"

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शुक्रवार, 22 नवंबर 2019

लोहड़ी अपना ऐतिहासिक महत्व खोता एक हिन्दू त्यौहार।

लोहड़ी अपना ऐतिहासिक महत्व खोता एक हिन्दू त्यौहार।

सुन्दरी मुंदरी होय
तेरा कौन विचारा होय
दूल्हा भट्टी वाला होय
दुल्हे ने धी ब्याई होय
सेर शक्कर आई होय
कुड़ी दे बोझे पाई होय
कुड़ी दा लाल पटाका होय
चाचे चूरी कुट्टी होय
जिमींदाराँ लुट्टी होय
जिमींदार सदाय होय
गिन गिन पोले लाये होय

                     ये उस गीत की कुछ पंक्तियाँ हैं जो लोहड़ी के अवसर पर रात में अग्नि प्रज्वल्लित करने के बाद लोग उसके चारों और प्रक्रिमा करते हुए गाते हैं। बच्चे इस त्यौहार को सामूहिक रूप से मनाने के लिए जब घर घर  जा कर चंदा मांगते हैं तब भी इसी गीत को गाते हैं। सदियों से इस अवसर पर गाया जाने वाला यह गीत स्वयं इसकी कहानी प्रमाणिकता से बताता है।
            यह किस्सा उस काल का है जब मुग़ल काल में हिन्दू मुस्लिमो के गुलाम हो चुके थे एवं मुस्लिम शासकों के अत्याचार से उनका जीवन तार – तार हो चुका था , न हिन्दुओं का जीवन सुरक्षित था न उनकी स्त्रियों की इज्जत्त।
                   ऐसे में प्रतिकार तो दूर की बात अपनी बहिन बेटियों की इज्जत बचा लेने में भी हिन्दू अपनी जीत समझते थे। लोहड़ी का त्यौहार भी इसी प्रकार का हिन्दू विजय दिवस है जिसे पंजाब के हिन्दू सदियों से मनाते आ रहे हैं।
लोहड़ी की पूरी कहानी इस प्रकार है –
                   पंजाब के लाहौर के पास शेखुपुरा एक क़स्बा है जो देश के विभाजन के बाद से पकिस्तान का हिस्सा बन गया है। अकबर के शासन काल में शेखुपुरा और उसके आस पास के इलाके में एक राजपूत हिन्दू वीर दूल्हा भट्टी वाला सकृय था। मुग़ल शासकों की नजर में वह एक डाकू था पर हिन्दुओं के द्रष्टिकोण से एक बागी हिन्दू लड़ाका  जो सरकारी खजानों को लूटता था व गरीब सताये हुए हिन्दुओं की  सहायता करता था। जब बादशाह अकबर उसके छापामार हमलों से परेशान हो गया तो उसने दूल्हा भट्टी वाले को जिन्दा या मुर्दा पकड़ कर लाने की जिम्मेदारी अपने एक किलेदार आसिफ खान को सौंपी। आसिफ खान एक सैनिक टुकड़ी ले कर उस ओऱ गया जिधर दूल्हा भट्टी वाले के होने की संभावना थी और एक गाँव की मस्जिद में डेरा डाला। पूस का महीना था सर्दी बहुत अधिक थी आसिफ खान ने सैनिकों की छोटी छोटी टुकड़ियों  को अलग अलग दिशा में दुल्हे को पकड़ने के लिए भेजा और स्वयं मस्जिद की छत पर लेट कर धूप सेकने लगा , इसी बीच कुछ लड़कियां मस्जिद के बाहर के कूएँ पर आयीं। इनमें एक लड़की विशेष रूप से सुन्दर थी तथा नाम भी सुन्दरी था। सुन्दरी को देखते ही आसिफ खान के मन में उसे पाने की इच्छा जागी। आसिफ खान ने सुन्दरी को अपने पास बुलाया , पर सुन्दरी डर कर भाग गयी। आसिफ खान ने मौलवी से पुछा की यह लड़की कौन है। मौलवी द्वारा यह बताये जाने पर की लड़की पास के गावं के ब्राहमण की लड़की है आसिफ खान ने लड़की के पिता को बुलाने के लिए कहा। ब्राह्मण को बुलाया गया और उसे कहा गया की वो अपनी लड़की सुन्दरी का निकाह आसिफ खान के साथ कर दे पर ब्राहमण इसके लिए तैरार नहीं हुआ। ब्राह्मण को कई प्रकार के प्रलोभन दिए गए , इस पर भी जब वह तैयार नहीं हुआ तो उसे डराया धमकाया गया। ब्राह्मण समझ गया की वह बुरी तरह फंस गया है अतः उस समय अपनी जान बचाने के लिए उसने बहाना बनाया कि अभी पूस का महीना चल रहा है और हिन्दुओं  में पूस के महीने में विवाह नहीं किया जाता, आसिफ खान ने ब्राह्मण को कुछ धन दिया और कहा की वो इससे लड़की के लिए कपड़े गहने आदि खरीदे। दूल्हा भट्टी वाला तो मिला नहीं अतः कुछ दिन बाद वापिस लौटने से पहले ब्राह्मण से कहा की पूस का महीना समाप्त होने पर वह आयेगा और सुन्दरी से निकाह करेगा। आसिफ खान तो लौट गया। परेशान ब्राह्मण ने सोचा की इस परिस्थिति में दूल्हा ही उसे बचा सकता है अतः वह दुल्हे को ढूँडने के लिए जंगल की और चला। दुल्हे से भेंट होने पर ब्राह्मण ने अपनी सारी परेशानी कि किस प्रकार मुस्लिम किलेदार आसिफ खान डरा धमका कर दबाव डाल कर जबरदस्ती उसकी बेटी से निकाह करने जा रहा है।
                   दुल्हे ने ब्राहमण को आश्वासन दिया कि वो चिंता न करे वह उसकी बेटी की रक्षा करेगा। दुल्हे ने एक ब्राहमण युवक को सुन्दरी से विवाह के लिए तैयार किया और पूस माह के आखिरी दिन गावं में आया और सुन्दरी को विवाह के लिए अपने साथ ले गया एवं पूस  मास की अंतिम रात्रि को जब पूस मास समाप्त हो रहा था और माघ मास शुरू हो रहा था उसका विवाह उस ब्राहमण युवक के साथ कर दिया , कन्या दान दुल्हे ने स्वयं किया।
               पूस मास समाप्त होने पर जब आसिफ खान सुन्दरी से निकाह करने के लिए आया तो उसे बताया गया की सुन्दरी का तो विवाह हो चुका है तो वह हाथ मलता रह गया व मन मसोस कर वापिस लौट गया।
              इस प्रकार एक हिन्दू युवती को जबरदस्ती निकाह द्वारा इस्लामीकारण के कुचक्र से बचाया जा सका। हिन्दुओं ने इसे अपनी विजय के रूप में देखा और हर वर्ष इसे लोहड़ी त्यौहार के रूप में मनाया जाने लगा , यह परंपरा आज तक चली आ रही है।
                लोहड़ी पर धर्म निरपेक्षता का चढ़ता रंग और अपने ऐतिहासिक महत्व को खोता त्योहार आज भारत में एक फैशन चल निकला है जिसका नाम धर्म निरपेक्षता है। ऐसे बहुत से व्यक्ति और संस्थाए पैदा हो गई है जिन्हें हिन्दू गौरव की घटनाओं में गर्व नहीं होता , हर बात में धर्म निरपेक्षता सोच पर हावी रहती है। लोहड़ी के त्यौहार में भी उन्होंने धर्म निरपेक्षता ढूँढने का प्रयास किया है।
               पंजाबी सभा के लोहड़ी के त्यौहार के कई आयोजनों में मैंने वक्ताओं को लोहड़ी के त्यौहार के बारे में भ्रमित करने वाले अलग अलग कारण बताते हुए सुना है।

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