कुलदेवता, कुलदेवी की पूजा करना क्यों आवश्यक है? - "अश्वमेध भारत"

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शनिवार, 23 नवंबर 2019

कुलदेवता, कुलदेवी की पूजा करना क्यों आवश्यक है?


कुलदेवताकुलदेवी की पूजा करना क्यों आवश्यक है?
                        भारत में हिन्दू पारिवारिक आराध्य व्यवस्था में कुलदेवता / कुलदेवी का स्थान सदैव से रहा है। प्रत्येक हिन्दू परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज हैं। जिनसे उनके गोत्र का पता चलता हैबाद में कर्मानुसार इनका विभाजन वर्णों में हो गया।
                        विभिन्न कर्म करने के लिएजो बाद में उनकी विशिष्टता बन गया और जाति कहा जाने लगा। हर जाति वर्गकिसी न किसी ऋषि की संतान है और उन मूल ऋषि से उत्पन्न संतान के लिए वे ऋषि या ऋषि पत्नी कुलदेव / कुलदेवी के रूप में पूज्य भी हैं। जीवन में कुलदेवता का स्थान सर्वश्रेष्ठ है। आर्थिक सुबत्ताकौटुंबिक सौख्य और शांति तथा आरोग्य के विषय में कुलदेवी की कृपा का निकटतम संबंध पाया गया है।
                        पूर्व के हमारे कुलों अर्थात पूर्वजों के खानदान के वरिष्ठों ने अपने लिए उपयुक्त कुल देवता अथवा कुलदेवी का चुनाव कर उन्हें पूजित करना शुरू किया थाताकि एक आध्यात्मिक और पारलौकिक शक्ति कुलों की रक्षा करती रहे जिससे उनकी नकारात्मक शक्तियों - ऊर्जाओं और वायव्य बाधाओं से रक्षा होती रहे तथा वे निर्विघ्न अपने कर्म पथ पर अग्रसर रह उन्नति करते रहें।
                        कुलदेवी - देवता दरअसल कुल या वंश की रक्षक देवी देवता होते है। ये घर परिवार या वंश परम्परा की प्रथम पूज्य तथा मूल अधिकारी देव होते है। सर्वाधिक आत्मीयता के अधिकारी इन देवो की स्थिति घर के बुजुर्ग सदस्यों जैसी महत्वपूर्ण होती है। अत: इनकी उपासना या महत्त्व दिए बगैर सारी पूजा एवं अन्य कार्य व्यर्थ हो सकते है।
                        इनका प्रभाव इतना महत्वपूर्ण होता है की यदि ये रुष्ट हो जाए तो अन्य कोई देवी देवता दुष्प्रभाव या हानि कम नही कर सकता या रोक नही लगा सकता। इसे यूं समझे – यदि घर का मुखिया पिताजी - माताजी आपसे नाराज हो तो पड़ोस के या बाहर का कोई भी आपके भले के लियेआपके घर में प्रवेश नही कर सकता क्योकि वे “बाहरी” होते है। खासकर सांसारिक लोगो को कुलदेवी देवता की उपासना इष्ट देवी देवता की तरह रोजाना करना ही चाहिये।
                        ऐसे अनेक परिवार देखने मे आते है जिन्हें अपने कुल देवी देवता के बारे में कुछ भी नही मालूम नही होता है। किन्तु कुलदेवी - देवता को भुला देने मात्र से वे हट नही जातेवे अभी भी वही रहेंगे।
                        यदि मालूम न हो तो अपने परिवार या गोत्र के बुजुर्गो से कुलदेवता - देवी के बारे में जानकारी लेवेंयह जानने की कोशिश करे की झडूला - मुण्डन संस्कार आपके गोत्र परम्परानुसार कहा होता हैया “जात” कहा दी जाती हैया विवाह के बाद एक अंतिम फेरा (५,,७ वां) कहा होता है। हर गोत्र - धर्म के अनुसार भिन्नता होती है. सामान्यत: ये कर्म कुलदेवी / कुलदेवता के सामने होते है और यही इनकी पहचान है।
                        समय क्रम में परिवारों के एक दुसरे स्थानों पर स्थानांतरित होनेधर्म परिवर्तन करनेआक्रान्ताओं के भय से विस्थापित होनेजानकार व्यक्ति के असमय मृत होनेसंस्कारों के क्षय होनेविजातीयता पनपनेइनके पीछे के कारण को न समझ पाने आदि के कारण बहुत से परिवार अपने कुल देवता / देवी को भूल गए अथवा उन्हें मालूम ही नहीं रहा की उनके कुल देवता / देवी कौन हैं या किस प्रकार उनकी पूजा की जाती है। इनमें पीढ़ियों से शहरों में रहने वाले परिवार अधिक हैंकुछ स्वयंभू आधुनिक मानने वाले और हर बात में वैज्ञानिकता खोजने वालों ने भी अपने ज्ञान के गर्व में अथवा अपनी वर्त्तमान अच्छी स्थिति के गर्व में इन्हें छोड़ दिया या इन पर ध्यान नहीं दिया।
                        कुल देवता / देवी की पूजा छोड़ने के बाद कुछ वर्षों तक तो कोई ख़ास अंतर नहीं समझ में आताकिन्तु उसके बाद जब सुरक्षा चक्र हटता है तो परिवार में दुर्घटनाओंनकारात्मक ऊर्जावायव्य बाधाओं का बेरोक - टोक प्रवेश शुरू हो जाता हैउन्नति रुकने लगती हैपीढ़िया अपेक्षित उन्नति नहीं कर पातीसंस्कारों का क्षयनैतिक पतनकलहउपद्रवअशांति शुरू हो जाती हैंव्यक्ति कारण खोजने का प्रयास करता हैकारण जल्दी नहीं पता चलता क्योकि व्यक्ति की ग्रह स्थितियों से इनका बहुत मतलब नहीं होता हैअतः ज्योतिष आदि से इन्हें पकड़ना मुश्किल होता हैभाग्य कुछ कहता है और व्यक्ति के साथ कुछ और घटता है।
                        कुल देवता या देवी हमारे वह सुरक्षा आवरण हैं जो किसी भी बाहरी बाधानकारात्मक ऊर्जा के परिवार में अथवा व्यक्ति पर प्रवेश से पहले सर्वप्रथम उससे संघर्ष करते हैं और उसे रोकते हैंयह पारिवारिक संस्कारों और नैतिक आचरण के प्रति भी समय समय पर सचेत करते रहते हैंयही किसी भी ईष्ट को दी जाने वाली पूजा को इष्ट तक पहुचाते हैंयदि इन्हें पूजा नहीं मिल रही होती है तो यह नाराज भी हो सकते हैं और निर्लिप्त भी हो सकते हैंऐसे में आप किसी भी इष्ट की आराधना करे वह उस इष्ट तक नहीं पहुँचताक्योकि सेतु कार्य करना बंद कर देता हैबाहरी बाधायेअभिचार आदिनकारात्मक ऊर्जा बिना बाधा व्यक्ति तक पहुचने लगती हैकभी कभी व्यक्ति या परिवारों द्वारा दी जा रही इष्ट की पूजा कोई अन्य बाहरी वायव्य शक्ति लेने लगती हैअर्थात पूजा न इष्ट तक जाती है न उसका लाभ मिलता है।
                        ऐसा कुलदेवता की निर्लिप्तता अथवा उनके कम शशक्त होने से होता है। कुलदेव परम्परा भी लुप्तप्राय हो गयी हैजिन घरो में प्राय: कलह रहती हैवंशावली आगे नही बढ रही हैनिर्वंशी हो रहे होंआर्थिक उन्नति नही हो रही हैविकृत संताने हो रही हो अथवा अकाल मौते हो रही होउन परिवारों में विशेष ध्यान देना चाहिए।
                        कुलदेवता या देवी सम्बंधित व्यक्ति के पारिवारिक संस्कारों के प्रति संवेदनशील होते हैं और पूजा पद्धतिउलटफेरविधर्मीय क्रियाओं अथवा पूजाओं से रुष्ट हो सकते हैंसामान्यतया इनकी पूजा वर्ष में एक बार अथवा दो बार निश्चित समय पर होती हैयह परिवार के अनुसार भिन्न समय होता है और भिन्न विशिष्ट पद्धति होती हैशादी - विवाहसंतानोत्पत्ति आदि होने पर इन्हें विशिष्ट पूजाएँ भी दी जाती हैंयदि यह सब बंद हो जाए तो या तो यह नाराज होते हैं या कोई मतलब न रख मूकदर्शक हो जाते हैं और परिवार बिना किसी सुरक्षा आवरण के पारलौकिक शक्तियों के लिए खुल जाता हैपरिवार में विभिन्न तरह की परेशानियां शुरू हो जाती हैंअतः प्रत्येक व्यक्ति और परिवार को अपने कुल देवता या देवी को जानना चाहिए तथा यथायोग्य उन्हें पूजा प्रदान करनी चाहिएजिससे परिवार की सुरक्षा - उन्नति होती रहे।
                        अक्सर कुलदेवीदेवता और इष्ट देवी देवता एक ही हो सकते हैइनकी उपासना भी सहज और तामझाम से परे होती है। जैसे नियमित दीप व् अगरबत्ती जलाकर देवो का नाम पुकारना या याद करनाविशिष्ट दिनों में विशेष पूजा करनाघर में कोई पकवान आदि बनाए तो पहले उन्हें अर्पित करना फिर घर के लोग खाएहर मांगलिक कार्य या शुभ कार्य में उन्हें निमन्त्रण देना या आज्ञा मांगकर कार्य करना आदि। इस कुल परम्परा की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की यदि आपने अपना धर्म बदल लिया हो या इष्ट बदल लिया हो तब भी कुलदेवी देवता नही बदलेंगेक्योकि इनका सम्बन्ध आपके वंश परिवार से है।
                        किन्तु धर्म या पंथ बदलने सके साथ साथ यदि कुलदेवी - देवता का भी त्याग कर दिया तो जीवन में अनेक कष्टों का सामना करना पद सकता है जैसे धन नाशदरिद्रताबीमारियादुर्घटनागृह कलहअकाल मौते आदि। वही इन उपास्य देवो की वजह से दुर्घटना बीमारी आदि से सुरक्षा होते हुवे भी देखा गया है।
                        ऐसे अनेक परिवार भी मैंने देखा है जिन्हें अपने कुल देवी देवता के बारे में कुछ भी नही मालूम। एक और बात ध्यान देने योग्य है - किसी महिला का विवाह होने के बाद ससुराल की कुलदेवी / देवता ही उसके उपास्य हो जायेंगे न की मायके के। इसी प्रकार कोई बालक किसी अन्य परिवार में गोद में चला जाए तो गोद गये परिवार के कुल देव उपास्य होंगे।
कुलदेवी / कुलदेवता के पूजन की सरल विधि :-
1. जब भी आप घर में कुलदेवी की पूजा करे तो सबसे आवश्यक चीज होती है पूजा की सामग्री। पूजा की सामग्री इस प्रकार ही होना चाहिये - ४ पानी वाले नारियललाल वस्त्र, 10 सुपारिया, 8 या 16 श्रंगार कि वस्तुयेपान के 10 पत्तेघी का दीपककुंकुमहल्दीसिंदूरमौलीपांच प्रकार की मिठाईपूरीहलवाखीरभिगोया चनाबताशाकपूरजनेऊपंचमेवा।
2. ध्यान रखे जहा सिन्दूर वाला नारियल है वहां सिर्फ सिंदूर ही चढ़े बाकि हल्दी कुंकुम नहीं। जहाँ कुमकुम से रंग नारियल है वहां सिर्फ कुमकुम चढ़े सिन्दूर नहीं।
3. बिना रंगे नारियल पर सिन्दूर न चढ़ाएंहल्दी - रोली चढ़ा सकते हैंयहाँ जनेऊ चढ़ाएंजबकि अन्य जगह जनेऊ न चढ़ाए।
4. पांच प्रकार की मिठाई ही इनके सामने अर्पित करें। साथ ही घर में बनी पूरी - हलवा - खीर इन्हें अर्पित करें।
5. ध्यान रहे की साधना समाप्ति के बाद प्रसाद घर में ही वितरित करेंबाहरी को न दें।
6. इस पूजा में चाहें तो दुर्गा अथवा काली का मंत्र जप भी कर सकते हैंकिन्तु साथ में तब शिव मंत्र का जप भी अवश्य करें।
7. सामान्यतः पारंपरिक रूप से कुलदेवता / कुलदेवी की पूजा में घर की कुँवारी कन्याओं को शामिल नहीं किया जाता। इसलिए उन्हें इससे अलग ही रखना चाहिये।
                        विशेष दिन और त्यौहार पर शुद्ध लाल कपड़े के आसान पर कुलदेवी / कुलदेवता का चित्र स्थापित करके घी या तेल का दीपक लगाकर गूगल की धुप देकर घी या तेल से हवन करकर चूरमा बाटी का भोग लगाना चाहिएअगरबत्तीनारियलसतबनी मिठाईमखाने दानेइत्रहर-फूल आदि श्रद्धानुसार।

नवरात्री में पूजा अठवाई के साथ परम्परानुसार करनी चाहिए।
                        पितृ देवता के पूजन की सरल विधि :- शुद्ध सफेद कपड़े के आसान पर पितृ देवता का चित्र स्थापित करकेघी का दीपक लगाकर गूगल धुप देकरघी से हवन करकर चावल की सेनक या चावल की खीर - पूड़ी का भोग लगाना चाहिए। अगरबत्ती नारियलसतबनी मिठाईमखाने दानेइत्रहर - फूल आदि श्रद्धानुसार।
चावल की सेनक : चावल को उबाल पका लेवे फिर उसमे घी और शक्कर मिला ले।
अठवाई : दो पूड़ी के साथ एक मीठा पुआ और उस पर सूजी का हलवाइस प्रकार दो जोड़े कुल मिलाकर ४ पूड़ी २ मीठा पुआ और थोड़ा सूजी का हलवा ।
                        कुलदेवी / कुलदेवता को नहीं पूजनेनही मानने के दुष्प्रभावपरिणाम :- कुलदेवता या कुलदेवी का हमारे जीवन में बहुत महत्व होता है। इनकी पूजा आदिकाल से चलती आ रही हैइनके आशिर्वाद के बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं होता है। यही वो देव या देवी है जो कुल की रक्षा के लिए हमेशा सुरक्षा घेरा बनाये रखती है।
                        आपकी पूजा पाठव्रत कथा जो भी आप धार्मिक कार्य करते है उनको वो आपके इष्ट तक पहुँचाते है। इनकी कृपा से ही कुल वंश की प्रगति होती है। लेकिन आज के आधुनिक युग में लोगो को ये ही नहीं पता की हमारे कुलदेव या देवी कौन है। जिसका परिणाम हम आज भुगत रहे हैं।
                        आज हमें यह पता ही नहीं चल रहा की हम सब पर इतनी मुसीबते आ क्यों रहे है बहुत से ऐसे लोग भी है जो बहुत पूजा पाठ करते हैबहुत धार्मिक है फिर भी उसके परिवार में सुख शांति नहीं है।
                        बेटा बेरोजगार होता है बहुत पढने - लिखने के बाद भी पिता पुत्र में लड़ाई होती रहती हैजो धन आता है घर मे पता ही नहीं चलता कौन से रास्ते निकल जाता है। पहले बेटे - बेटी की शादी नहीं होतीशादी किसी तरह हो भी गई तो संतान नहीं होती। ये संकेत है की आपके कुलदेव या देवी आपसे रुष्ट है।
                        आपके ऊपर से सुरक्षा चक्र हट चूका हैजिसके कारण नकारात्मक शक्तियां आप पर हावी हो जाती है। फिर चाहे आप कितना पूजा - पाठ करवा लो कोइ लाभ नहीं होगा।
                        लेकिन आधुनिक लोग इन बातो को नहीं मानते। आँखे बन्द कर लेने से रात नहीं हो जाती। सत्य तो सत्य ही रहेगा। जो हमारे बुजुर्ग लोग कह गए वो सत्य हैभले ही वो आप सबकी तरह अंग्रेजी स्कूल में ना पढ़े हो लेकिन समझ उनमे आपसे ज्यादा थी। उनके जैसे संस्कार आज के बच्चों में नहीं मिलेंगे।
                        आपसे निवेदन है की अपने कुलदेव या कुलदेवी का पता लगाऐ और उनकी शरण में जाये। अपनी भूल की क्षमा माँगे और नित्य कुलदेवता / कुलदेवी की भी पूजा किया जाता है।


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