डाकुओं ने बनवाया था यह मंदिर, यहां माता को लगाया जाता है मदिरा का भोग! - "अश्वमेध भारत"

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शनिवार, 30 नवंबर 2019

डाकुओं ने बनवाया था यह मंदिर, यहां माता को लगाया जाता है मदिरा का भोग!


डाकुओं ने बनवाया था यह मंदिर, यहां माता को लगाया जाता है मदिरा का भोग!
                 हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जिसमें हर धार्मिक काम में देवियों को भी अवश्य पूजा जाता है। हिंदू धर्म में धन के लिये माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है, ज्ञान के लिये माता सरस्वती की पूजा होती है और बल की लिये माता दुर्गा की पूजा होती है। भारत में माता के कई मंदिर है जिनमें साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। आज हम भी आपको माता के एक ऐसे ही मंदिर में बताने जा रहे हैं। माता के इस मंदिर की खासियत यह है कि इसे डाकुओं द्वारा बनाया गया था और यहां माता को ढाई प्याला शराब का भोग लगाया जाता है।

                 यह मंदिर माता भुवाल काली माता का है जो कि राजस्थान के नागौर जिले में स्थित है। यहां पर माता की पूजा के दौरान उन्हें ढाई प्याला शराब का चढ़ाया जाता है। इसके बाद प्याले में जो शराब बचती है उसे भैरव बाबा को चढ़ा दिया जाता है।

कब हुआ था निर्माण
                 शिलालेखों की मदद से पता चला है कि यह मंदिर विक्रम संवत् 1380 में बना था। इस मंदिर में देवी-देवताओं की आकर्षक प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। इसके साथ ही मंदिर में एक गुप्त कक्ष भी है जिसे गुफा कहा जाता है। यहां माता को दो स्वरुपों माता काली और ब्राह्मणी के रुप में पूजते हैं। जहां ब्रह्मणी देवी को मिठाई का भोग लगाया जाता है वहीं माता काली को शराब का भोग लगता है। इस मंदिर के पुजारी और स्थानीय लोगों का मानना है कि इस मंदिर से कोई खाली हाथ नहीं लौटता है।

कैसे हुई थी माता प्रकट
                 भुवाल काली माता खेजड़ी के पेड़ के नीचे से प्रकट हुई थीं ऐसा माना जाता है। एक पुरानी कहानी के अनुसार इसी स्थान पर एक बार डाकु़ओं को राजा की सेना ने घेर लिया था। डाकुओं को प्राण बचाने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो उन्होंने सच्चे मन से माता का ध्यान किया और प्राण बचाने की दुआ मांगी। माता ने अपनी चमत्कारी शक्ति से डाकुओं की सेना को भेड़-बकरियों में बदल दिया। जब राजा की सेना चली गई तो डाकू वापस अपने स्वरुप में आ गए। इसके बाद डाकुओं ने उसी जगह पर मंदिर का निर्माण करवाया।

मंदिर में भोग लगाने का है नियम
                 इस मंदिर में जब भी लोग आते हैं कोई न कोई मन्नत अवश्य मांगते हैं। अगर मन्नत पूरी हो गई तो भक्त दोबारा माता के मंदिर में भोग लगाने आते हैं हालांकि इस मंदिर में भोग लगाने का भी एक नियम है। इस नियम के अनुसार भक्त ने जितना प्रसाद भोग लगाने की मन्नत मांगी थी केवल उतना ही भोग लगाया जाना चाहिये, न ज्यादा न कम। यहां माता को जब मदिरा का भोग लगाया जाता है तो उस समय माता के मुख की तरफ देखना वर्जित है।

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