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लक्ष्मीजी की बडी बहन दरीद्रा।




लक्ष्मीजी की बडी बहन दरीद्रा।
                        कार्तिक मास की द्वादशी तिथि को पिता समुद्र ने दरिद्रा देवी का कन्यादान कर दिया। विवाह के बाद दु:सह ऋषि जब दरिद्रा को लेकर अपने आश्रम पर आए तो उनके आश्रम में वेदमन्त्र गुंजायमान हो रहे थे। वहां से ज्येष्ठा दोनों कान बंद कर भागने लगी। यह देखकर दु:सह मुनि उद्विग्न हो गये क्योंकि उन दिनों सब जगह धर्म की चर्चा और पुण्यकार्य हुआ करते थे। सब जगह वेदमन्त्रों और भगवान के गुणगान से बचकर भागते-भागते दरिद्रा थक गई।
तब दरिद्रा ने मुनि से कहा–
                 ’जहां वेदध्वनि, अतिथि-सत्कार, यज्ञ-दान, भस्म लगाए लोग आदि हों, वहां मेरा निवास नहीं हो सकता। अत: आप मुझे किसी ऐसे स्थान पर ले चलिए जहां इन कार्यों के विपरीत कार्य होता हो।
                  दु:सह मुनि उसे निर्जन वन में ले गए। वन में दु:सह मुनि को मार्कण्डेय ऋषि मिले। दु:सह मुनि ने मार्कण्डेय ऋषि से पूछा कि ‘इस भार्या के साथ मैं कहां रहूं और कहां न रहूं?’
दरिद्रा के प्रवेश करने के स्थान :-
                     मार्कण्डेय ऋषि ने दु:सह मुनि से कहा–जिसके यहां शिवलिंग का पूजन न होता हो तथा जिसके यहां जप आदि न होते हों बल्कि रुद्रभक्ति की निन्दा होती हो, वहीं पर तुम निर्भय होकर घुस जाना।
                    जहा पति-पत्नी परस्पर झगड़ा करते हों, घर में रात्रि के समय लोग झगड़ा करते हों, जो लोग बच्चों को न देकर स्वयं भोज्य पदार्थ खा लेते हों, जो स्नान नहीं करते, दांत-मुख साफ नहीं करते, गंदे कपड़े पहनते, संध्याकाल में सोते व खाते हों, जुआ खेलते हों, ब्राह्मण के धन का हरण करते हों, परायी स्त्री से सम्बन्ध रखते हों, हाथ-पैर न धोते हों, उस घर में तुम दोनों घुस जाओ।
दरिद्रा के प्रवेश न करने के स्थान :-
                       मार्कण्डेयजी ने दु:सह मुनि को कहा–जहां नारायण व रुद्र के भक्त हों, भस्म लगाने वाले लोग हों, भगवान का कीर्तन होता हो,घर में भगवान की मूर्ति व गाये हों उस घर में तुम दोनों मत घुसना। जो लोग नित्य वेदाभ्यास में संलग्न हों, नित्यकर्म में तत्पर हों तथा वासुदेव की पूजा में रत हों, उन्हें दूर से ही त्याग देना।
                      तथा जो लोग वैदिकों, ब्राह्मणों, गौओं, गुरुओं, अतिथियों तथा रुद्रभक्तों की नित्य पूजा करते हैं, उनके पास मत जाना।
                      यह कहकर मार्कण्डेय ऋषि चले गए। तब दु:सह मुनि ने दरिद्रा को एक पीपल के मूल में बिठाकर कहा कि मैं तुम्हारे लिए रसातल जाकर उपयुक्त आवास की खोज करता हूँ। दरिद्रा ने कहा–’तब तक मैं खाऊंगी क्या?’ मुनि ने कहा–’तुम्हें प्रवेश के स्थान तो मालूम हैं, वहां घुसकर खा-पी लेना। लेकिन जो स्त्री तुम्हारी पुष्प व धूप से पूजा करती हो, उसके घर में मत घुसना।’
                      यह कहकर मुनि बिल मार्ग से रसातल में चले गए। लेकिन बहुत खोजने पर भी उन्हें कोई स्थान नहीं मिला। कई दिनों तक पीपल के मूल में बैठी रहने से भूख-प्यास से व्याकुल होकर दरिद्रा रोने लगीं। उनके रुदन से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया। उनके रोने की आवाज को जब उनकी छोटी बहन लक्ष्मीजी ने सुना तो वे भगवान विष्णु के साथ उनसे मिलने आईं।
                       दरिद्रा ने भगवान विष्णु से कहा–’मेरे पति रसातल में चले गए है, मैं अनाथ हो गई हूँ, मेरी जीविका का प्रबन्ध कर दीजिए।’
                       भगवान विष्णु ने कहा–’हे दरिद्रे! जो माता पार्वती, शंकरजी व मेरे भक्तों की निन्दा करते हैं, शंकरजी की निन्दा कर मेरी पूजा करते हैं, उनके धन पर तुम्हारा अधिकार है। तुम सदा पीपल (अश्वत्थ) वृक्ष के मूल में निवास करो। तुमसे मिलने के लिए मैं लक्ष्मी के साथ प्रत्येक शनिवार को यहां आऊंगा और उस दिन जो अश्वत्थ वृक्ष का पूजन करेगा, मैं उसके घर लक्ष्मी के साथ निवास करुंगा।’ उस दिन से दरिद्रादेवी पीपल के नीचे निवास करने लगीं।
देवताओं द्वारा दरिद्रा को दिए गए निवास योग्य स्थान :-

                         पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में बताया गया है–जिसके घर में सदा कलह होता हो, जो झूठ और कड़वे वचन बोलते हैं, जो मलिन बुद्धि वाले हैं व संध्या के समय सोते व भोजन करते हैं, बहुत भोजन करते हैं, मद्यपान में लगे रहते हैं, बिना पैर धोये जो आचमन या भोजन करते हैं, बालू, नमक या कोयले से दांत साफ करते हैं, जिनके घर में कपाल, हड्डी, केश व भूसी की आग जलती हो, जो छत्राक (कुकुरमुत्ता) तथा सड़ा हुआ बेल खाते हैं, जहां गुरु, देवता, पितर और अतिथियों का पूजन तथा यज्ञदान न होता हो, ब्राह्मण, सज्जन व वृद्धों की पूजा न होती हो, जहां द्यूतक्रीडा होती हो, जो दूसरों के धन व स्त्री का अपहरण करते हों, वहां अशुभ दरिद्रे तुम सदा निवास करना।

लक्ष्मीजी की बडी बहन दरीद्रा। Reviewed by Admin on अक्तूबर 19, 2019 Rating: 5

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