योग क्या है उसके आवश्यक नियम, महत्त्व और लाभ?


योग क्या है ?
                       योग शब्दों के बारे में भाष्यकारों के अपने-अपने मत हैं। कुछ भाष्यकारों ने योग शब्द को वियोग’, ‘उद्योग’ और ‘संयोग’ के अर्थों में लिया हैतो कुछ लोगों का कहना है कि योग आत्मा और प्रकृति के वियोग का नाम है। कुछ कहते हैं कि यह एक विशेष उद्योग अथवा यत्न का नाम हैजिसकी सहायता से आत्मा स्वयं को उन्नति के शिखर पर ले जाती है। इसी सम्बन्ध में कुछ लोगों का विचार है कि योग ईश्वर और प्राणी के संयोग का नाम है। सच तो यह है कि योग में ये तीनों अंग सम्मिलित हैं। अन्तिम उद्देश्य संयोग हैजिसके लिए उद्योग की आवश्यकता होती है और इसी उद्योग का स्वरूप ही यह है कि प्रकृति से वियोग किया जाए।
योग के प्रकार और उनका महत्व
• योग के अंग–योग के आठ अंग होते हैं-यमनियमआसनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान और समाधि।
• यम पांच होते हैंजिनको हम समाज से सम्बन्धित होने के कारण ‘सामाजिक धर्म कहेंगे।
• नियम भी पांच हैं।
चूंकि यह व्यक्ति से सम्बन्ध रखते हैंअतः इन्हें हम ‘वैयक्तिक धर्म’ कहेंगे। यम और नियम योग में प्रवेश करने वालों के लिए ऐसे आवश्यक अंग हैंजैसे किसी मकान के लिए उसकी नींव होती है।
• वास्तव में योगाभ्यास का आरम्भ ‘आसन से होता हैजो योग का तीसरा अंग है। आसन का अन्नमय–कोश से सम्बन्ध है। आसन करने से अन्नमय कोश सुन्दर और स्वस्थ बनता है। शरीर निरोगी और तेजस्वी बनता है।
• प्राणायाम का प्राणमय कोश से सम्बन्ध है। प्राणायाम करने से प्राणमय कोश की वृद्धि होती है और प्राण शुद्धि होती है।
• प्रत्याहार और धारणा का मनोमय कोश (कर्मेन्द्रियों) से सम्बन्ध होता है। इससे इन्द्रियों का निग्रह होता है। मन निर्विकारी और स्वच्छ बनता हैऔर उसका विकास होता है।
• धारणा का विज्ञानमय कोश (ज्ञानेन्द्रियों) से सम्बन्ध है। इससे बुद्धि का शुद्धिकरण और विकास होता है।
• समाधि का आनन्दमय कोश (प्रसन्नताप्रेमअधिक तथा कम आनन्द) से सम्बन्ध है। इससे आनन्द की प्राप्ति होती है।आइये जाने जीवन में योग का महत्व ।
योग आसन के फायदे और लाभ
(1) योगासनों का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे सहज साध्य और सर्वसुलभ हैं। योगासन ऐसी व्यायाम पद्धति है जिसमें न तो कुछ विशेष व्यय होता है और न इतनी साधन-सामग्री की आवश्यकता होती है।
(2) योगासन अमीर-गरीबबूढे-जवानसबल–निर्बल सभी स्त्री-पुरुष कर सकते है।
(3) आसनों में जहां मांसपेशियों को ताननेसिकोड़ने और ऐंठने वाली क्रियायें करनी पड़ती हैंवहीं दूसरी ओर साथ-साथ तनाव-खिंचाव दूर करने वाली क्रियायें भी होती रहती हैंजिससे शरीर की थकान मिट जाती है और आसनों से व्यय शक्ति वापिस मिल जाती है। शरीर और मन को तरोताजा करनेउनकी खोई हुई शक्ति की पूर्ति कर देने और आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से भी योगासनों का अपना अलग महत्त्व है।
(4) योगासनों से भीतरी ग्रंथियां अपना काम अच्छी तरह कर सकती हैं और युवावस्था बनाए रखने एवं वीर्य रक्षा में सहायक होती हैं।
(5) योगासनों द्वारा पेट की भली-भांति सुचारु रूप से सफाई होती है और पाचन अंग पुष्ट होते हैं। पाचन-संस्थान में गड़बड़ियां उत्पन्न नहीं होतीं ।
(6) योगासन मेरुदण्ड-रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और व्यय हुई नाड़ी शक्ति की पूर्ति करते हैं।
(7) योगासन पेशियों को शक्ति प्रदान करते हैं। इससे मोटापा घटता है और दुर्बल-पतला व्यक्ति तन्दुरुस्त होता है।
(8) योगासन स्त्रियों की शरीर रचना के लिए विशेष अनुकूल हैं। वे उनमें सुन्दरतासम्यक विकाससुघड़ता और गतिसौन्दर्य आदि के गुण उत्पन्न करते हैं।
(9) योगासनों से बुद्धि की वृद्धि होती है और धारणा शक्ति को नई स्फूर्ति एवं ताजगी मिलती है। ऊपर उठने वाली प्रवृत्तियां जागृत होती हैं और आत्म-सुधार के प्रयत्न बढ़ जाते हैं।
(10) योगासन स्त्रियों और पुरुषों को संयमी एवं आहार-विहार में मध्यम मार्ग का अनुकरण करने वाला बनाते हैंअतः मन और शरीर को स्थाई तथा सम्पूर्ण स्वास्थ्यमिलता है।
(11) योगासन श्वास–क्रिया का नियमन करते हैं. हृदय और फेफड़ों को बल देते हैंरक्त को शुद्ध करते हैं और मन में स्थिरता पैदा कर संकल्प शक्ति को बढ़ाते हैं।
(12) योगासन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वरदान स्वरूप हैं क्योंकि इनमें शरीर के समस्त भागों पर प्रभाव पड़ता हैऔर वह अपना कार्य सुचारु रूप से करते हैं।
(13) आसन रोग विकारों को नष्ट करते हैंरोगों से रक्षा करते हैंशरीर को निरोगस्वस्थ एवं बल्ठि बनाए रखते हैं।
(14) आसनों से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। आसनों का निरन्तर अभ्यास करने वाले को चश्मे की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
(15) योगासनों से शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम होता हैजिससे शरीर पुष्टस्वस्थ एवं सुदृढ़ बनता है। आसन शरीर के पांच मुख्यांगोंस्नायु तंत्ररक्ताभिगमन तंत्रश्वासोच्छवास तंत्र की क्रियाओं का व्यवस्थित रूप से संचालन करते हैं जिससे शरीर पूर्णतः स्वस्थ बना रहता है और कोई रोग नहीं होने पाता। शारीरिकमानसिकबौद्धिक और आत्मिक सभी क्षेत्रों के विकास में आसनों का अधिकार है। अन्य व्यायाम पद्धतियां केवल बाह्य शरीर को ही प्रभावित करने की क्षमता रखती हैंजब कि योगासन मानव का चहुँमुखी विकास करते हैं।
योगाभ्यास के आवश्यक  नियम
                योगाभ्यास के लिए आवश्यक बातें -योगाचरण का अधिकार बिना किसी भेद-भाव के हर नर-नारी मात्र को है। योगमात्र साधु-संन्यासियों और वैरागियों के लिए हैयह धारणा गलत है। हांजिस व्यक्ति के हृदय में पिपासाअभीप्साश्रद्धा और विश्वास हैवही इसका अधिकारी हैफिर वह चाहे कोई भी हो।
              योग प्रक्रिया एक साधना हैजिससे पूर्ण लाभान्वित होने के लिए इसके महत्त्व को ध्यान में रखते हुए यह विश्वास करना चाहिए कि जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए योगाभ्यास किया जा रहा हैउसमें निश्चित रूप से सफलता मिलेगी। योग पद्धति अपने आप में पूर्ण एवं समर्थ हैं। योग अभ्यास द्वारा रोग निवारण किया जाना संभव है। योगाभ्यास से सम्बद्ध निम्नलिखित नियमों एवं अपेक्षाओं को भी ध्यान में रखना एवं समझना आवश्यक है।
              योग में प्रविष्ट होने के लिए आवश्यक है कि देह शुद्ध और स्वस्थ होभोजन शुद्धसात्त्विकस्वल्प हो। श्रद्धाविश्वासअभीप्सा और पिपासा हो।
(1) योगाभ्यास करते समय मन में कोई दुर्विचार या तनाव नहीं होना चाहिए। मन प्रसन्न एवं प्रफुल्लित हो और रोजमर्रा की समस्त चिन्ताओं एवं समस्याओं को भूलकर मन योग प्रक्रिया में सलग्न हो।
(2) योगाभ्यास करने का सही समय –
         योगाभ्यास कभी भी शुरू किया जा सकता हैलेकिन शरद ऋतु से प्रारम्भ करने को सर्वोत्तम काल माना गया है। शौचादि से निवृत्त होकर जलपान के पूर्व प्रातःकाल का समय योग क्रिया के लिए श्रेष्ठतम है। कोई व्यक्ति इसे शाम को या किसी अन्य समय में भी कर सकता हैपर इसकी शर्त यह है कि योगाभ्यास आरंभ करने से तीन-चार घंटे पहले कुछ भी खाना नहीं चाहिए। यहां तक कि चायरस और पानी आदि पीने के एक दम बाद भी योगाभ्यास न करेंबल्कि इसमें भी प्रायः आधा घंटे का समय देना जरूरी है। आसनों का अभ्यास करते समय शरीर के साथ कोई जबरदस्ती न करें और उसे सामान्य एवं विश्राम की स्थिति में रखना चाहिए। प्रतिदिन एक ही निश्चित समय पर योगाभ्यास करने का प्रयास करना चाहिए।
(3) स्थान-
योगाभ्यास के लिए स्थान स्वच्छखुला और हवादार होना चाहिए। गर्मियों में इसके लिए बाग-बगीचा यो खुला मैदान अधिक उपयुक्त है। यदि इसकी सुविधा न हो तो मकान की छत का प्रयोग किया जा सकता है। सर्दियों में योगासन बन्द कमरे में भी किए जा सकते हैंलेकिन रोशनी और हवा के लिए खिड़कियां आदि इस तरह खुली रहनी चाहिए कि ठण्डी हवा के झोंके सीधे आपको न लग सकें। योगाभ्यास के लिए समतल भूमि का चुनाव करें। जमीन पर दरीचटाई या कम्बल बिछा लेना चाहिए। सर्दियों में रुई के गद्दे अथवा कम्बल का भी प्रयोग किया जा सकता सकता है
योगासन नस-नाड़ियों के खिंचाव का व्यायाम है। अतः नियम यह है कि प्रत्येक खिंचाव के बाद नसों-नाड़ियों को आराम मिलना चाहिएतभी अगला आसन सफलतापूर्वक किया जा सकता है। विश्राम के लिए शवासन उत्तम है। अतः प्रत्येक आसन के बाद इसका अभ्यास करना चाहिए।
(4) विश्राम-
नियमित योगाभ्यास करने के बाद शरीर को थकावट अनुभव नहीं होनी चाहिए। जब शरीर थकने लगेतो आसन बन्दकर विश्राम कर लेना चाहिए। विश्राम का सामान्य सिद्धान्त यह है कि वास्तविक अभ्यास काल का एक चौथाई समय विश्राम में लगाएं । उदाहरण के लिए यदि किसी ने बीस मिनट तक योगाभ्यास किया होतो अन्त में पांच मिनट का विश्राम होना चाहिए।
(5) स्नान-
योगाभ्यास से पूर्व यदि गर्म जल से स्नान कर लिया जायतो शरीर लचीला हो जाता हैजिससे आसन करने में सुविधा रहती है। वैसे ठण्डे जल से भी स्नान किया जा सकता है। गर्म जल से आसनों के बाद भी स्नान किया जा सकता हैलेकिन ठण्डे जल से स्नान करने के लिए कम-से-कम 15-20 मिनट का अन्तर होना आवश्यक है। नहाने के बादआसनों के पूर्व शरीर भली भांति पोंछकर सुखा लेना चाहिए और बाल भी न गीले रहने चाहिए।
(6) वस्त्र-
योगासन करते समय आवश्यकतानुसार (मौसम या शारीरिक क्षमता के अनुकूल) वस्त्र धारण करें। जहां तक सम्भव हो शरीर पर कम-से-कम वस्त्र होने चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि वस्त्र कुछ ढीले-ढाले होंताकि योग प्रक्रिया में रुकावट न पैदा करें । अभ्यासी पुरुष अण्डरवियर के साथ हाफ पैन्ट या पाजामा पहन सकते हैं। अभ्यासी महिलायें ब्लाउज के साथ साड़ीस्लेक्स आदि पहन सकती
(7) सूर्य स्नान-
प्रातःकाल सूर्य स्नान किया जाये तो आसनों से विशेष लाभ होता है।
(8) यदि शरीर में विषैले पदार्थों की उपस्थिति होगीतो शीर्षासन करने से हानि भी हो सकती हैअतः इसका ध्यान रखें। हाथों में खुजली या सूजन हो या आंतों में वायु व अम्ल होंतो इसका अर्थ यह है कि शरीर में विषैले तत्त्व मौजूद हैं।
(9) उचित आहार-
योग पद्धति में आहार का प्रमुख स्थान है। अतः जो व्यक्ति उचित आहार नहीं लेता और आहार के सिद्धान्तों की समझ नहीं रखतावह अपना शारीरिक और मानसिक तौर पर धीरे-धीरे नुकसान ही करता है। क्योंकि आहार के प्रकार तथा गुण का प्रभाव व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक स्थितियों पर पड़ता है।

योगाभ्यास के लिए आदर्श दिनचर्या :
योगाभ्यास करने वालों को निम्न दिनचर्या भी ध्यान में रखनी चाहिए
(1) प्रातः 4 से 5 बजे-ब्रह्म मुहूर्त में उठना।
(2) प्रातः 5 से 6 बजे-शौचदन्त सफाई और स्नान आदि।
(3) प्रातः 6 से 7 बजे-आसनप्राणायाम।
(4) प्रातः 7 से 8 बजे-हवनस्वाध्यायप्रतिराश।
(5) प्रातः 8 से 9 बजे-पारिवारिक कार्य।
(6) प्रातः 9 से 10 बजे-भोजन।
(7) प्रातः 10 से 5 बजे सायं तक-अपना व्यवसायिक कार्य ।
(8) सायंकाल 5 से 6 बजे-पारिवारिक कार्य।
(9) सायंकाल 6 से 7 बजे-शौचआसनसंध्याहवन ।
(10) सायंकाल 7 से 8 बजे-भ्रमणस्वाध्याय ।
(11) सायंकाल 8 से 9 बजे–भोजन।
(12) सायंकाल 9 से 10 बजे-संगीतव्याख्यानसत्संगस्वाध्याय आदि। दिनभर के अच्छे-बुरे कामों का चिन्तन।
आइये जाने योग कैसे करें ,योग करने की विधि
योगाभ्यास की विधि :
योग का पूरा-पूरा लाभ उठाने के लिए उसे ठीक ढंग से करना चाहिए। आसन में गहरे और लम्बे श्वास बाहर छोड़ना चाहिए। शरीर को मोड़ते हुए श्वास बाहर छोड़ना चाहिए। शरीर को सीधा करते हुए अथवा पहली स्थिति में आते हुए श्वास खींचना चाहिए। चूंकि यह एक वैज्ञानिक पद्धति हैअतः इसे एक विशेष प्रकार से करने की आवश्यकता है। आसनप्राणायामबंध तथा मुद्राएं प्रमाणित विधियों-नियमों के अनुसार सम्पन्न किए जाएं तो शरीर संस्थान पर योग द्वारा विशेष लाभ होता है।
आसनों में दिए जाने वाले समय का निर्धारण व्यक्तिगत अभ्यास पर निर्भर करता हैजैसे 15 से 40 मिनट तक किये जा सकते हैं। सर्वांगासन के समय को धीरे-धीरे क्रम से बढ़ाकर 10मिनट तक किया जा सकता है। इसकी पहली और अन्तिम स्थिति में जाने और आने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। यह क्रम धीरे-धीरे करना चाहिए। इसके अलावा अन्य आसनों की स्थिति में कुछ समय का विश्राम करना भी उचित होता है।
कई लोगों का शारीरिक गठन कुछ इस प्रकार का होता है कि उन्हें सीधे-सीधे आसन करने में भी परेशानी का अनुभव होता है और उन्हें विशेष प्रकार से कठिनाई होती है। लेकिन ऐसे लोगों के लिए परामर्श यह है कि उन्हें धैर्यपूर्वक योगाभ्यास करते रहना चाहिए। निरन्तर योगाभ्यास से शरीर लचीला बनता जायेगाजिससे उनकी परेशानी-कठिनाई का निवारण होता जायेगा। यह जरूरी नहीं कि प्रत्येक आसन की शीघ्र सिद्धि हो जाये। इसमें समय लगता है। अतः धैर्यपूर्वक विश्वास करके अभ्यास करते हुए आगे बढ़ाना चाहिए।
कठिन रोगों में जब तक किसी अनुभवी पथप्रदर्शक से पूरी जानकारी हासिल न कर लेंतब तक आसन नहीं करना चाहिए। साधारण रोगों में भी पथप्रदर्शन आवश्यक है।

अपने नियम आसनों को करने के बाद प्राणायाम करना चाहिए। इसका अभ्यास भी धीरे-धीरे बढ़ना चाहिए।

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