ऐसा कौन-सा कुआँ है जिसमें गिरने के बाद मनुष्य बाहर ही नहीं निकलता?


अनोखा कुआँ।

                             अनोखा कुआँ राजा भोज एक आध्यात्मिक व्यक्ति थे। वे चाहते थे कि प्रजा का ज्ञान बढे, आनंद बढे, माधुर्य बढे और मरने के बाद नहीं, जीते-जी प्रजा आध्यात्म-तत्व का आनंद ले। महाकवि कालिदासजी भी उसी राजदरबार के कवि थे। तो ऐसे-ऐसे प्रश्न होते थे कि प्रजा की सुझबुझ बढ़ जाय। आमिर बाँटकर खाते और गरीब अमीरों को देखकर ईर्ष्या नहीं करते थे। वे ज्ञान में ही तृप्त रहते थे। उनका अध्यात्म राज्य था। जैसे रामराज्य, कृष्णराज्य ... ऐसे ही उन्हींके पदचिन्हों पर चलनेवाले राजा भोज थे। एक बार राजा भोज की सभा में एक सवाल उठा कि ऐसा कौन-सा कुआँ है जिसमें गिरने के बाद मनुष्य बाहर ही नहीं निकलता ?’ तो इस प्रश्न का उत्तर कोई नहीं दे पाया। आखिर राजा भोज ने राजपंडित को कहा : राजपंडित ! आपको प्रणाम है। आज तक जिन प्रश्नों के उत्तर कोई नहीं दे पाया, जहाँ लोग निरुत्तर हो गये वहाँ आपने उत्तर दिये और राज्य की तरफ से आपका सम्मान भी हुआ है। बहुत सारी भेंटे और इनाम भी आपको मिले है। अब हम आपसे प्रार्थना करते है कि यह एक गहरा प्रश्न है, इसका उत्तर अभी भले आप नहीं दे पायें तो कोई हरकत नहीं। लेकिन ७ दिन के अंदर इस प्रश्न के उत्तर की हम आपसे उम्मीद करते है। अगर आप उत्तर नहीं दे पाए तो आज तक के जितने इनाम आपको मिले है, सब आपको वापस करने होंगे और इस नगरी को छोडकर आपको दूसरी जगह जाना होगा।बड़ी खतरनाक चुनौती सुनकर राजपंडित उत्तर खोजने लगा। ६ दिन बीते, कोई उत्तर ही नहीं मिला। सोचा, ‘अब क्या करें ?’ तो खुली हवाओं में जाना चाहिए। शुद्ध वातावरण से बुद्धि में थोड़ी शुद्धि आती है। वह जंगल की तरफ गया तो वहाँ से एक गडरिया गुजरा।
बोला : आप तो राजपंडित है, राजा भोज के दुलारे है पर आज आप इतने उदास-से क्यों दिखाई दे रहे हैं ?” राजपंडित : तेरे को क्या पता ? मेरा तो जीवनभर का यश, कमाई और इनाम सब छीन लिये जायेंगे और ऐसे महान राजा की नगरी से मुझे निकाला जायेगा तो मैं कहाँ अपना मुँह दिखाऊंगा ? इसलिए चिंतित हूँ।” “पर बात क्या है ?” “अब तुमको क्या बताऊँ ?” “बता दो। हो सकता है कि हम भले गडरिया हैं, लेकिन सत्संग में जाते हैं और हमारे गुरु ब्रम्हज्ञानी है, कुछ मदद कर सकें।ब्रम्हज्ञानी का चेला भी कभी-कभी ऐसा काम कर देता है कि पंडित भी देखते रह जाते है।अरे यार ! तू इतना हिम्मत से बोलता है ! तो ऐसा है, सवाल है कि ऐसा कौन-सा कुआँ है जिसमें गिरा हुआ मनुष्य निकलता ही नहीं ?” उस गडरिया को गुरु ने तो दे रखा था मंत्र, श्वास अंदर जाय तो ॐ, बाहर आये तो एक... ऐसा करके वह ब्रम्ह-परमात्मा में चला गया। था तो गडरिया, राजपंडित के आगे तो दो पैसे का था लेकिन ब्रम्हज्ञानी का चेला जो था। उसके पास था न बड़ा बल ! श्वासों की गिनती द्वारा गडरिया ने ॐ के अधिष्ठान आत्मा में विश्रांति पायी। उस युक्ति सूझी। बोला : पंडितजी ! अब क्या करें....” “क्या करें क्या? कल का दिन है। राजा मुझे निकाल देगा।” “राजा निकाल देगा तो क्यों डरते हो ? मेरे पास एक चीज है।” “क्या है ?” “तुम तो विद्वान पंडित हो, ढेर सारा लोहा इकट्ठा करके रोज सोना बनाओ। एक भोज क्या लाखों भोज तुम्हारे पीछे-पीछे घूमेंगे।” “बात तो बढ़िया है किंतु सोना कैसे मिलेगा ?” “तुम मेरे चेले बन जाओ, मैं तुमको पारस दे दूँगा।” “तू तो दो पैसे का गडरिया और मैं राजपंडित ! तेरा कैसे चेला बनूँ ?” “मत बनो।” “अच्छा ! मैं तुम्हारा चेला बनता हूँ।” “अब बात गयी। बात काट दी न तुमने।” “और कोई उपाय बताओ।” “उपाय यह है कि भेड़ का दूध पियो और मेरे चेले बनो तो मैं देता हूँ पारस।” “अरे ! भेड़ का दूध ब्राम्हण के लिए माना है। पंडित भेड़ का दूध पिये तो बुद्धि मारी जायेगी।” “तो जाओ।” “अच्छा समझो, भेड़ का दूध भी पी लेता हूँ, तुम्हारा चेला भी बनता हूँ ....” “अब तो बात गयी।” “तो क्या करें फिर ?” “भेड़ का दूध पियो, मेरे चेले बनो इससे काम नहीं चलेगा। अब तो वह दूध पहले मैं पिऊँ, जूठा करूँ, फिर तुन्हें पीना पड़ेगा।” “तू तो यार हद करता है ! ब्राम्हण को जूठा पिलायेगा ?” “छोडो।” “अच्छा पीता हूँ।” “वह बात गयी। अब सामने जो मरे हुए इन्सान की खोपड़ी का कंकाल पड़ा है, उसमें मैं दूध दोहूँगा, उसको मैं जूठा करूँगा, कुत्ते को चटवाऊँगा, फिर तुम पियोगे। तब मिलेगा पारस। नहीं तो आप अपना रास्ता लीजिये।” “खोपड़ी के कंकाल में पंडित दूध पिये ! बड़ी कठिन बात है पर मैं तैयार हूँ।” “बस, यही तो कुआँ है ! लोभ, तृष्णा का कुआँ ऐसा है कि उसमें मनुष्य गिरता जाता है, गिरता जाता है ....

                            आशा ही जीव को जन्म-जन्मांतर तक भटकाती रहती है। मरुभूमि में पानी के बीना मृग का छटपटाकर मर जान भी इतना दु:खद नहीं है, जितना तृष्णावान का दु:खी होना है। शरीर की मौत की छटपटाहट पाँच-दस घंटे या पाँच-दस दिन रहती है लेकिन जीव तृष्णा के पाश में युगों से छटपटाता आया है, गर्भ से श्मशान तक ऐसी जन्म-मृत्यु की यात्राएँ करता आया है लेकिन इस आशा-तृष्णा के कारण कितने-कितने जन्म हुए यह नहीं गिन सकते। हजार कमाये, लाख बना लिये, लाख का करोड़ बनाया, करोड़ के दस करोड़ बनाये, सौ करोड़ बनाये, हजार करोड़ बनाये.... लेकिन और नोचो और नोचो...। तबीयत खराब हो रही है, बुद्धि खराब हो रही है। ह्रदयाघात हो रहा है, बेटा ऐसा हो रहा है, बेटी ऐसी हो रही है, जमाइयों का ऐसा हो रहा है लेकिन खपे-खपे (चाहिए-चाहिए) में वे खपे जा रहे हैं। ऐसे कुएँ में सारे खदबदा रहे हैं। जब गडरिया ऐसा जवाब देता है तो अध्यात्मबल की कैसी बलिहारी है !

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