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सतगुरु वचन। - ५९

पापकर्म हमारी मन की शांति खा जाएगा, हमें वैराग्य से हटाकर भोग में रूचिकराएगा जबकि पुण्यकर्म हमारे मन की शांति बढ़ता जाएगा, हमारी रूचि परमात्मा की ओर बढाता जायेगा। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ प्रेमी आगे-पीछे का चिन्तन नहीं करता। वह न तो किसी आशंका से भयभीत होता है और न वर्त्तमान परिस्थिति में प्रेमास्पद में प्रीति के सिवाय अन्य कहीं आराम पाता है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ जीव का मूल स्वरुप सच्चिदानंद है। वह सत होने से सदा रहना चाहता है, चित्त होने से जानना चाहता है और आनंदस्वरूप होने से सुखी रहना चाहता है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ यह आत्मा ही ब्रह्म है, ऐसा ज्ञान, वास्तविक ज्ञान निर्वासनिक होने से होता है। सुख बाँटने की चीज है तथा दुःख को पैरों तले कुचलने की चीज है। दुःख को पैरों तले कुचलना सीखो, न ही दुःख में घबराहट। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः। एक सामान्य योगी होता है जो ध्यान, समाधि आदि करके शांति व आनंद का अनुभव करता है। दूसरे होते हैं अभ्यास योगी। ये आनन्द का अनुभव करते हुए ऊपर आते हैं तो इनका हृदयकमल खिलता है। कभी भी गोता मारते हैं और शांत हो जाते हैं, लेकिन जो सुख-दुःख के समय भी विचलित न हो, अपने आत्मा-परमात्मा में टिका रहे वह गीता के मत में परम योगी है। उसका चित्त सुख-दुःख के आकर्षण में प्रवाहित न होकर सम रहता है। ऐसे योगी नित्य अपने प्रेमस्वरूप परमात्मा को, ईष्ट को, गुरू को स्नेह करते हैं और उन्हें यह नया रस प्राप्त होता है जिसके सम्मुख संसार का साम्राज्य तो क्या, इन्द्र का वैभव भी कुछ नहीं। अतः आप भी मन में गांठ बाँध लें। सुख-दुःख में सम रहते हुए, सासांरिक आकर्षणों में प्रवाहित होते लोगों की दौड़ में सम्मिलित न होकर 'मुझे तो सत्य-स्वरूप ईश्वरीय आत्मसमता में रहना है' इस हेतु नित्य प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में उठकर, सूर्योदय से पहले स्नानादि करके शुद्ध होकर शांत बैठो। अपनी त्रुटियों और कमजोरियों को याद करके 'हरि ॐ' गदा मारकर उन्हें भगाकर सोऽहम्..... शिवोऽहम् स्वरूप में स्वयं को प्रतिष्ठित करो। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ आत्मज्ञान का विचार करना, यह प्रकाश करना है। ज्ञान का प्रकाश करके अविद्यारूपी अंधकार को हटाना है। आपकी हृदय गुफा में तो पहले से ही ऐसा दीपक विद्यमान है, जिसका तल और बाती कभी समाप्त ही नहीं होती। आवश्यकता है तो बस, ऐसे सदगुरू की जो अपनी ज्ञानरूपी ज्योत से आपकी ज्योत को जला दें। जैसे सूर्य के ताप से उत्पन्न बादल कुछ समय के लिए सूर्य को ही ढँक लेते हैं, ऐसे ही आप भी अज्ञान का पर्दा चढ़ गया है। जैसे जल में उत्पन्न बुदबुदा जल ही है, परंतु वह जल तब होगा जब अपना परिच्छिन्न अस्तित्व छोड़ेगा। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ हम बोलना चहते हैं तभी शब्दोच्चारण होता है, बोलना न चाहें तो नहीं होता। हम देखना चाहें तभी बाहर का दृश्य दिखता है, नेत्र बंद कर लें तो नहीं दिखता। हम जानना चाहें तभी पदार्थ का ज्ञान होता है, जानना नहीं चाहें तो ज्ञान नहीं होता। अतः जो कोई पदार्थ देखने, सुनने या जानने में आता है उसको बाधित करके बाधित करनेवाली ज्ञानरूपी बुद्धि की वृत्ति को भी बाधित कर दो। उसके बाद जो शेष रहे वह ज्ञाता है। ज्ञातृत्व धर्मरहित शुद्धस्वरूप ज्ञाता ही नित्य सच्चिदानन्द ब्रह्म है। निरंतर ऐसा विवेक करते हुए ज्ञान व ज्ञेयरहित केवल चिन्मय, नित्य, विज्ञानानन्दघनरूप में स्थिर रहो। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ इस सम्पूर्ण जगत को पानी के बुलबुले की तरह क्षणभंगुर जानकर तुम आत्मा में स्थिर हो जाओ। तुम अद्वैत दृष्टिवाले को शोक और मोह कैसे ? ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ आनन्द से ही सबकी उत्पत्ति, आनन्द में ही सबकी स्थिति एवं आनन्द में ही सबकी लीनता देखने से आनन्द की पूर्णता का अनुभव होता है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ यह स्थूल भौतिक पदार्थ इन्द्रियों की भ्रांति के सिवाय और कुछ नहीं हैं। जो नाम व रूप पर भरोसा रखता है, उसे सफलता नहीं मिलती। सूक्ष्म सिद्धांत अर्थात् सत्य आत्म-तत्व पर निर्भर रहना ही सफलता की कुंजी है। उसे ग्रहण करो, उसका मनन करो और व्यवहार करो। फिर नाम-रूप आपको खोजते फिरेंगे। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ नम्रतापूर्वक पूज्यश्री सदगुरू के पदारविन्द के पास जाओ। सदगुरू के जीवनदायी चरणों में साष्टांग प्रणाम करो। सदगुरू के चरणकमल की शरण में जाओ। सदगुरू के पावन चरणों की पूजा करो। सदगुरू के पावन चरणों का ध्यान करो। सदगुरू के पावन चरणों में मूल्यवान अर्घ्य अर्पण करो। सदगुरू के यशःकारी चरणों की सेवा में जीवन अर्पण करो। सदगुरू के दैवी चरणों की धूलि बन जाओ। ऐसा गुरूभक्त हठयोगी, लययोगी और राजयोगियों से ज्यादा सरलतापूर्वक एवं सलामत रीति से सत्य स्वरूप का साक्षात्कार करके धन्य हो जाता है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ दृश्य में प्रीति नहीं रहना ही असली वैराग्य है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ जीव को प्रेम करने की तो आदत है, वासना है। इस प्रेम को ऊर्ध्वमुखी बनाना है। देखने की वासना है तो ठाकुरजी को देखो। किसी का होने की वासना है तो भगवान के हो जाओ। 'मैं पत्नी का हूँ.... मैं पति की हूँ...' इसके स्थान पर 'मैं भगवान का हूँ.... भगवान मेरे हैं' यह भाव बना लो। जैसे गाड़ी का चालक चक्र घुमाने से गाड़ी की दिशा बदल जाती है ऐसे ही अपनी अहंता और ममता को, 'मैं' और 'मेरे' पने को बदलने से बहुत सारा बदल जाएगा। 'मैं घनश्याम हूँ..... मैं पत्नी का हूँ.... मैं संसारी हूँ..... मैं गृहस्थी हूँ.......' ऐसा भान रखने से उस प्रकार की वासना और जवाबदारी रहेगी। 'मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं......' यह अहंता बदलने से जीवन बदल जाएगा। हम स्वयं को आत्मा मानेंगे, परमात्मा का अंश मानेंगे तो अपने में आत्मा की अहंता करेंगे, देह की अहंता मिट जाएगी। देह की अहंता मिटते ही जाति की संकीर्णता मिट जाएगी। अपने मन की मान्यताओं की संकीर्णताएँ मिट जाएगी। 'मैं भगवान का हूँ.... भगवान मेरे हैं....।' भगवान सत् चित् आनन्दस्वरूप हैं तो सुख के लिए, आनन्द के लिए हमें इन्द्रियों की गुलामी नहीं करनी पड़ेगी। इन्द्रियों का उपयोग करने की ताकत बढ़ जाएगी। इन्द्रियों की गुलामी के बजाय इन्द्रियों का उपयोग करोगे तो इन्द्रियों में जल्दी से बीमारी भी नहीं आयेगी। शरीर तंदुरूस्त रहेगा, मन-बुद्धि में लाचारी नहीं रहेगी। जब इन्द्रियों का सुख लेते हो तो बकरी बन जाते हो। सुख आत्मा का लो और उपयोग इन्द्रियों का करो। जीवन सिंह जैसा बन जाएगा, व्यवहार और परमार्थ सब ठीक हो जाएगा। ये सब बातें सत्संग के बिना समझ में भी नहीं आतीं, इन बातों में रूचि भी नहीं होती और इनके रहस्य हृदय में प्रकट भी नहीं होते। इसीलिए सत्संग की बड़ी महिमा है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
सतगुरु वचन। - ५९ Reviewed by Admin on जनवरी 13, 2016 Rating: 5

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