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और कब तक चुप रहोगे ?


और कब तक चुप रहोगे ? 
(स्वामी विवेकानंद जयंती - १२ जनवरी (दिनांक अनुसार)/३१ जनवरी (तिथि अनुसार)) 
               स्वामी विवेकानंदजी जब विदेश से भारत आ रहे थे, तब जलयान में दो ईसाई  मिशनरी जानबूझकर स्वामीजी के साथ हिन्दू धर्म एवं ईसाई धर्म की तुलनात्मक  चर्चा करने लगे । जब आलोचना में वे दोनों पछाड खाने लगे, तब उन्होंने  अत्यंत भद्दी व अश्लील भाषा में हिन्दू धर्म व हिन्दुओं की निंदा शुरू कर  दी । स्वामीजी जब तक हो सका धैर्य धारण किये रहे परंतु अंत में उनसे न  रहा गया । उनके पास जाकर स्वामीजी ने अचानक उनमें से एक की कमीज का कॉलर  कसकर पकडा और दृढ स्वर से बोले : ''यदि मेरे धर्म की निंदा की तो जहाज से  नीचे फेंक दूँगा ।  वह ईसाई डर के मारे काँपता हुआ बोला : ''कृपया मुझे छोड दीजिये, फिर कभी  ऐसी भूल नहीं करूँगा । उसके पश्चात् जब भी जहाज में उनकी स्वामीजी से  मुलाकात होती, वे दोनों नम्रता से पेश आते ।  भारत वापस आकर एक दिन उपरोक्त घटना का उल्लेख करते हुए विवेकानंदजी ने  प्रियनाथ सिंह से कहा : ''अच्छा, सिंह ! तुम्हारी माँ का यदि कोई अपमान  करता तो तुम क्या करते ?  प्रियनाथ सिंह ने जवाब दिया : ''महाशय ! उसकी गर्दन पकडकर उसे उचित दंड देता । 
                    स्वामीजी बोले : ''अच्छी बात है । यदि तुम्हारे मन में धर्म के प्रति भी  ठीक वैसी ही भक्ति रहती तो तुम कभी भी एक हिन्दू लडके को ईसाई होते नहीं  देख सकते थे । परंतु देखो, आजकल रोज ऐसी घटनाएँ घट रही हैं परंतु तुम लोग  चुप्पी साधे बैठे हो । तुम लोगों की धर्मनिष्ठा किधर गयी ? देश के प्रति  ममता किधर गयी ? रोज तुम्हारे सामने ये पादरी लोग तुम्हारे धर्म को  गालियाँ दे रहे हैं परंतु कितनों ने इसका प्रतिकार करने की चेष्टा की है  ? तुम लोगों में से कितनों का रक्त इससे गर्म हुआ है ?  धर्मोरक्षति रक्षितः । 'जो अपने धर्म की रक्षा करता है वह रक्षित रहता है  । ध्यान रहे : सहिष्णुता के नाम पर हम कहीं अपने में कायरता और  पलायनवादिता का दुर्गुण तो नहीं भर रहे हैं ?  (लोक कल्याण सेतु : जुलाई २००३)

और कब तक चुप रहोगे ? Reviewed by Admin on जनवरी 13, 2016 Rating: 5

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