संत की अवहेलना का दुष्परिणाम ।

संत की अवहेलना का दुष्परिणाम । आत्मानंद की मस्ती में रमण करने वाले किन्हीं महात्मा को देखकर एक सेठ ने सोचा कि ‘ब्रह्मज्ञानी के सेवा बड़े भाग्य से मिलती है। चलो, अपने द्वारा भी कुछ सेवा हो जाय।’ यह सोचकर उन्होंने अपने नौकर को आदेश दे दिया कि “रोज शाम को महात्माजी को दूध पिलाकर आया करो।” नौकर क्या करता कि दूध के पैसे तो जेब में रख लेता और छाछ मिल जाती थी मुफ्त में तो नमक-मिर्च मिलाकर छाछ का प्याला बाबाजी को पिला आता। एक बार सेठ घूमते-घामते महात्माजी के पास गये और उनसे पूछाः “बाबाजी ! हमारा नौकर आपको रोज शाम को दूध पिला जाता है न?” बाबाजीः “हाँ, पिला जाता है।” बाबाजी ने विश्लेषण नहीं किया कि क्या पिला जाता है। नौकर के व्यवहार से महात्माजी को तो कोई कष्ट नहीं हुआ, किंतु प्रकृति से संत की अवहेलना सहन नहीं हुई। समय पाकर उस नौकर को कोढ़ हो गया, समाज से इज्जत-आबरू भी चली गयी। तब किसी समझदार व्यक्ति ने उससे पूछाः “भाई ! बात क्या है? चारों ओर से तू परेशानी से घिर गया है !” उस नौकर ने कहाः “मैंने और कोई पाप तो नहीं किया किंतु सेठ ने मुझे हर रोज एक महात्मा को दूध पिलाने के लिए कहा था। किंतु मैं दूध के पैसे जेब में रखकर उन्हें छाछ पिला देता था, इसलिए यह दुष्परिणाम भोगना पड़ रहा है।”

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