सतगुरु वचन। - ९

साधक यदि अभ्यास के मार्ग पर उसी प्रकार आगे बढ़ता जाये, जिस प्रकार प्रारम्भ में इस मार्ग पर चलने के लिए उत्साहपूर्वक कदम रखा था, तो आयुरूपी सूर्य अस्त होने से पहले जीवनरूपी दिन रहते ही अवश्य 'सोऽहम् सिद्धि' के स्थान तक पहुँच जाये। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ लोग जल्दी से उन्नति क्यों नहीं करते ? क्योंकि बाहर के अभिप्राय एवं विचारधाराओं का बहुत बड़ा बोझ हिमालय की तरह उनकी पीठ पर लदा हुआ है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ गम्भीर-से-गम्भीर कठिनाइयों में भी अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रखो। क्षुद्र अबोध जीव तुम्हारे विरूद्ध क्या कहते हैं इसकी तनिक भी परवाह मत करो। जब तुम संसार के प्रलोभनों और धमकियों से नहीं हिलते तो तुम संसार को अवश्य हिला दोगे। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ अपने आप को सदैव पूर्ण शांत और आनंद मग्न रखो । चाहे जैसी घटना हो उसमे व्याघात नही होना चाहिये ।भूख-प्यास ,रोग ,दुःख ,अपमान और मृत्यु ।सदैव प्रसन्नचित्त और शांत रहो क्योंकि तुम परमात्मा के अंश हो,परम तत्व हो । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ सब विश्व मायामात्र है , ऐसा जिसे विश्वास है । सो मृत्यु सम्मुख देखकर, लाता न मन में त्रास है ।। नहीं आस जीने की जिसे, और त्रास मरने की न हो । हो तृप्त अपने आपमें, कैसे भला फिर दीन हो? ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ साधना की शुरुआत श्रद्धा से होती है लेकिन समाप्ति ज्ञान से होनी चाहिये | ज्ञान माने स्वयंसहित सर्व ब्रह्मस्वरूप है ऐसा अपरोक्ष अनुभव | ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ शांत चित्त में सत्त्वगुण बढ़ने से तन एवं मन के रोग दूर होते हैं। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ सुख की लालसा एवं दुःख के भय से मन अपवित्र होता है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ सुखस्वरूप परमात्मा का ध्यान किया जाय एवं दुःखहारी श्रीहरि की शरण सच्चे हृदय से ग्रहण की जाय तो आधि व्याधि की चोटें ज्यादा नहीं लगतीं। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ प्रेम ईश्वर से करे एवं इच्छा संसार की रखे अथवा प्रेम संसार से करे एवं इच्छा ईश्वर की रखे ऐसा मनुष्य उलझ जाता है परंतु जो बुद्धिमान है वह ईश्वर-प्राप्ति की इच्छा से ही ईश्वर को प्रेम करता है। उसकी सांसारिक परिस्थितियाँ प्रारब्धवेग से चलती रहती हैं। लोकदृष्टि से सब प्रवृत्तियाँ करते हुए भी उसकी गौण एवं मुख्य दोनों वृत्तियाँ ईश्वर में ही रहती हैं। वह ईश्वर को ही प्रेम करता है एवं ईश्वर को ही चाहता है। ईश्वर नित्य है अतः उसे विनाश का भय नहीं होता। ईश्वर सदा अपने आत्मरूप है अतः उस विवेकी को वियोग का संदेह भी नहीं रहता। अतः आप भी ईश्वर की इच्छा करें एवं ईश्वर से ही प्रेम करें, इससे भय एवं संदेह निश्चिंतता एवं शुद्ध प्रेम में परिणत हो जायेंगे। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ महापुरुष का आश्रय प्राप्त करने वाला मनुष्य सचमुच परम सदभागी है। सदगुरु की गोद में पूर्ण श्रद्धा से अपना अहं रूपी मस्तक रखकर निश्चिंत होकर विश्राम पाने वाले सत्शिष्य का लौकिक एवं आध्यात्मिक मार्ग तेजोमय हो जाता है। सदगुरु में परमात्मा का अनन्त सामर्थ्य होता है। उनके परम पावन देह को छूकर आने वाली वायु भी जीव के अनन्त जन्मों के पापों का निवारण करके क्षण मात्र में उसको आह्लादित कर सकती है तो उनके श्री चरणों में श्रद्धा-भक्ति से समर्पित होने वाले सत्शिष्य के कल्याण में क्या कमी रहेगी ? ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ गुरु-नाम उच्चारण करने पर गुरुभक्त का रोम-रोम पुलकित हो उठता है चिंताएँ काफूर हो जाती हैं, जप-तप-योग से जो नही मिल पाता वह गुरु के लिए प्रेम की एक तरंग से गुरुभक्त को मिल जाता है, इसे निगुरे नहीं समझ सकते। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ एक आत्मदृष्टि ही सार है, बाकी सब परिश्रम है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ बुद्धि अगर आध्यात्मिक हो जाय तो भगवान समग्र स्वरुप में प्रकट हो जायेंगे। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ सदगुरु की गोद में पूर्ण श्रद्धा से अपना अहं रूपी मस्तक रखकर निश्चिंत होकर विश्राम पाने वाले सत्शिष्य का लौकिक एवं आध्यात्मिक मार्ग तेजोमय हो जाता है। सदगुरु में परमात्मा का अनन्त सामर्थ्य होता है। उनके परम पावन देह को छूकर आने वाली वायु भी जीव के अनन्त जन्मों के पापों का निवारण करके क्षण मात्र में उसको आह्लादित कर सकती है तो उनके श्री चरणों में श्रद्धा-भक्ति से समर्पित होने वाले सत्शिष्य के कल्याण में क्या कमी रहेगी? ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ संसार कल्पित मानता, नहीं भोग में अनुरागता । सम्पत्ति पा नहीं हर्षता, आपत्ति से नहीं भागता ।। निज आत्म में संतृप्त है, नहीं देह का अभिमान है । ऐसे विवेकी के लिए, सब हानि-लाभ समान है।। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ जो चीज मिलती है उसका सदुपयोग नही होता तो दुबारा वह चीज नही मिलती। मानव देह मिली, बुध्दी मिली और उसका सदुपयोग नही किया,सुख-दु:ख की लपटो मे स्वाहा हो गये तो दुबारा मानव देह नही मिलेगी। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ आप जगत के प्रभु बनो अन्यथा जगत आप पर प्रभुत्व जमा लेगा | ज्ञान के मुताबिक जीवन बनाओ अन्यथा जीवन के मुताबिक ज्ञान हो जायेगा | फिर युगों की यात्रा से भी दुःखों का अन्त नहीं आयेगा | ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ मूर्खता को छोड कर हर हालत में आनंद का अनुभव करो । तुम्हें दुःख आ ही नही सकता । तुम दुःख को ग्रहण करते हो इसी से दुःख आता है । ग्रहण करना छोड दो फिर कोई भी दुःख तुम्हारे पास तक नही फटकेगा । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ कितना बडा आश्चर्य है कि वासना मन मेँ होती है कर्म इंद्रियाँ करती हैँ और सुख दुख की थप्पडेँ अज्ञानी जीव खाता है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ जीवन मेँ ऐसे कर्म करेँ की जीवन यज्ञ बन जाए। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ दृण निश्चय वाले को प्रतिकूलता मेँ भी राह मिल ही जाती है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ बहते संसार के सुख-दुख और आकर्षण विकर्षण मेँ चट्टान की नाँईँ सम और निर्लेप रहना ही बहादुरी है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ शांत मन मेँ इश्वर की प्रेरणा और बल मिलता है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ सदैव सम एवं प्रसन्नचित्त रहना इश्वर की सर्वोपरि भक्ति है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ यदि मनुष्य विवेकबुद्धि करके सदैव सतर्क एवं सावधान रहे यो उसे कोई भी विपरीत परिस्थिति हिला नहीं सकती। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

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