राजा पदम् और लीलावती संवाद। संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग प्रवचन से।

राजा पदम् और लीलावती संवाद । संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग प्रवचन से। योगवशिष्ठ सिद्धांत ग्रन्थ है। लीलावती की कथा पूरी करते-करते बीच में बोलते हैं के ये जगत स्वपन मात्र है। लीलावती और उसके पति की बहुत बनती थी। राज्य उद्यान में जाते, कभी वन विचरण करते । और एक दूसरे को प्रश्न पूछते और उनका उत्तर देते । दोनों की खूब बनती थी । लीलावती ने सोचा के मेरा पति कभी ना मरे । सरस्वती की १३ महीने की उपासना की । दूध पे रहे, मौन रहे, सरस्वती का जप करे, ध्यान करे । माँ सरस्वती प्रकट हो गई । सरस्वती माता प्रकट तो हुई वर्म गुहियात । वरदान मांग लीले । मेरा पति कभी ना मरे । बोले लीला ऐसा वरदान तो संभव नहीं । जो पैदा होता है मरता है । लेकिन ये मरकर कहीं दूसरे ब्रह्माण्ड में ना जाये, इसी मंडल में रहे । ये मैं तुम्हे वरदान देती हूँ । और जब तुम याद करोगी बोले मैं आ जाऊँगी । लीला को संतोष हुआ । वर्षों की कतारें बीती । राजा पदम और शत्रुओं ने धावा बोल दिया । घमासान युद्ध हुआ । वफादार मंत्री और सैनिक युद्ध में मारे गए । लीलावती को पता चला, अपने पति के शव को देखकर विलाप करने लगी । उस जमाने की जो कुछ विद्धियाँ थी जैसे नाभि पर घी रख देना, मुँह में घी दाल देना, आँखों पर घी की पट्टी लगा देना, मुंह में तुलसी के पत्ते डाल देना । बहुत एन्टी बायोटिक हो जाता है और बैक्टेरिया आदि कम फैलते हैं । गाये के गोबर के कंडे का धुँवा कर देना जिससे हानिकारक कीटाणु पैदा ही ना हो और हों तो चट हो जाएँ । ये सब करके पति के शव को रख दिया सुरक्षित और खुद सरस्वती के ध्यान में लग गयी । माँ सरस्वती को प्रकट करूँ । सरस्वती प्रकट हुई । लीला विलाप करती हुई के ये ऐसा हो गया । बोले उसका शरीर यहाँ है, लेकिन वो कहाँ है मैं तुझे लेके चलु तो तुम दुःख भूल जाओगे । लीले, इस आत्म चैतन्य की महिमा नहीं जानते इसीलिए लोग जरा-जरा बात में दुखी हो जाते हैं, जरा-जरा बात में आतंकित हो जाते हैं, भयभीत हो जाते हैं । जो तुम्हारा वास्तविक, जो तू हो उसको कोई मार नहीं सकता लेकिन जो तुम्हारा शरीर है उसको तुम सदा रख नहीं सकते । लीलावती अब चलो । मैं तुम्हे अपने योगबल से अन्तवाहक शरीर से तुम्हारे पति के पास ले चलती हूँ । सरस्वती ने लीलावती को एक कमरे में बंद किया, हाथ रखा । शरीर वहीँ रहा, और अन्तवाहक- शुक्ष्म शरीर से सरस्वतीजी के साथ लीला उड़ने में समर्थ हो गयी । सरस्वती का संकल्प सामर्थ्य था । आकाश में उड़ते-उड़ते ये जो दीखते हैं सब चाँद-तारे आदि इनको भी लाँघ के दूसरे ब्रह्माण्ड में प्रविष्ठ होने की जरूरत नहीं पड़ी । वरदान मिला था के इसी ब्रह्माण्ड में रहेंगें । तो लीलावती ने अपने पति को देखा के ये तो सिंघासन पर बैठे हैं । वही मंत्री जो मर गए हैं वोही मंत्री और यहां भी उन्होंने राज्य स्थापित कर दिया । ये तो उनको देखे राजा पदम को और मंत्रियों को लेकिन वो लोग उनको ना देखें । तो बोले माँ ये मैं क्या देखती हूँ ? बोले जिसकी जैसी-जैसी है वो फिर इसी ब्रह्माण्ड में अन्तवाहक शरीर से ही वैसा विचरण करते हैं । मरता है तो ये खोखा शरीर मरता है । अभी तेरे को और आश्चर्य दिखाती हूँ मेरे साथ चल । सरस्वती का संकल्प, और लीलावती इस ब्रह्माण्ड को लाँघकर दूसरे ब्रह्माण्ड में प्रविष्ठ हुई । इस ब्रह्माण्ड का जो सूरज है, चंदा है, तारे हैं, जहाँ तक विज्ञानं की और आपके मन की पहुँच है । उससे पार जब ॐ कार की उपासना करते तो इस ब्रह्माण्ड को चीरकर आगे के ब्रह्माण्ड से एकाकार हो सकता है वो जोगी, साधक । लगातार ॐ कार की उपासना हो तो । तो दूसरे ब्रह्माण्ड में गए और वहाँ सात्विक अरण्य में देखते हैं के तुलसी का पौधा लगा है । ये तो मैंने लगाया है माँ । और ये घर तो मेरा है । ये बच्चे रो रहे हैं । ये क्या है ? बोले तुम्हारा नाम अरुणदती था । और तुम्हारे पति जो राजा पदम हुए उनका नाम था वशिष्ठजी । श्री राम के गुरु वशिष्ठ और गुरु पत्नी अरुणदती नहीं । तुम भी इस ब्रह्माण्ड के अरुणदती और वशिष्ठ थे । और सात्विक जीवन यापन करते थे । राजा की सवारी पसार हुई और उसका बड़ा जैकारा था । तो तुम लोगों के मन में हुआ के काश हम भी राजा होते । राजवी सुख भोगते । यहाँ तो तप करते-करते कई वर्षों की कतारें बीत गयी । ऐसा तुम दोनों के चित में हुआ । समय पाकर दोनों का शरीर शांत हुआ । और मानवीय ब्रह्माण्ड में तुम ने राजा पदम और लीलावती के रूप में राज सुख देखा । ये जो बच्चे हैं, इस ब्रह्माण्ड की समय की धरा । वहाँ के १०० वर्ष बीत जाते हैं तो यहाँ के १०० दिन । अभी तो बच्चे यहाँ तुम्हारी याद में रो भी रहे हैं । उनको तो लगता है माँ अभी ८ महीने हुए, १० महीने हुए मर गए और तुमने वहाँ १०० वर्ष भोग लिए । तो हर ब्रह्माण्ड का समय भी अलग-अलग होता है। जैसे आपका एक दिन बैक्टेरियों की कई पीढ़ियाँ बदल जाएँगी । आपका एक सप्ताह मच्छर की कई पीढ़ियां बदल जाएँगी । लेकिन आपका एक सप्ताह में मनुष्य की एक पीढ़ी भी नहीं बदलेगी । आपके १० साल में भी मनुष्य की पीढ़ी नहीं बदलेगी । तो सबका अपना समय और ये देश, काल, सब काल्पनिक है । हर जगह का अपना नियम काम करता है । तो ये मैं क्या देखती हूँ ? लीलावती ने पूछा । भगवान राम को उनके गुरु वशिष्ठजी बताता हैं । ये जो दीखता है इतना ही जगत नहीं है । और ये एक ब्रह्माण्ड अपना है जिसको जिसके ये सूर्य, ब्रह्माजी, विष्णुजी है । ऐसे ही दूसरे ब्रह्माण्डों के दूसरे ब्रह्मा, विष्णु, महेश । तो आप इस वहम में ना पड़ो के बेटे का क्या होगा, बेटी का क्या होगा, मेरा क्या होगा ? अनंत ब्रह्माण्डों में घूम रहे हो तुम अनंत काल से । सब चल रहा है, तुम्हारी कभी मौत नहीं होती और शरीर सदा रहता नहीं है । तो लीलावती ने अपने बच्चों को देखा और सरस्वती बोले बच्चे को तुम देखती हो, बच्चे तुम्हे नहीं देख सकते । क्यों नही देखते? के हम अन्तवाहक में हैं । शुक्ष्म में । जैसे टी.वी. में सारे दृश्य दीखते और यहाँ नहीं दिख रहे हैं । अभी टी.वी. में कितनी चैनलें चलती होंगी? रेडियो पे अभी कितने स्टेशन चलते होंगे । इस समय तो धमा-धमी होगी। लेकिन अपन नहीं देख सकते। क्योंकी अपन स्थूल में हैं और यांत्रिक शूक्ष्मता से पकड़ा जायेगा । यांत्रिक शूक्ष्मता से भी अन्तवाहक शरीर और शुक्ष्म होता है । इसीलिए वो हमको नहीं देखेंगें । अगर हम संकल्प करें के वो हमको देखे तो वो देख सकेंगें । तो वास्तव में जैसे लीलावती थी वैसे ही आप हो। लेकिन उसने, लीलावती ने, सरस्वती की कृपा से अन्तवाहक शरीर की यात्रा कर ली । अगर आप ऐसी यात्रा करो अथवा सरस्वती मिल जाएँ तो आपको पता चलेगा जहाँ से अभी आये वहाँ तो अभी २ साल भी नही बीते यहाँ ५० साल का हो गया । ना जाने कितने- कितने ब्रह्माण्डों में घूम-घुमाके तुम्हारी यहाँ यात्रा हुई और इसके बाद ना जाने कहाँ-कहाँ जाओगे । ये आपको आश्चर्यकारक ज्ञान सुनाई पड़ता होगा । आप समझते होगा चलो मैं गुड़गावं में हूँ, इतने साल का हूँ, ये करूंगा, ऐसा करूँगा । अरे ऐसे तो कई जन्मों से कहीं के कहीं कुछ करते आये । देखत नैन चलो जग जाहि, का माँगू कछु स्थिर ना रहाई ॥ जो भी कुछ मांगेंगे वो स्थिर नहीं रहता। तो अब ऐसा माँगो की जो हमसे छूटे नहीं। तो वो ऐसा है के अपने आत्मा-परमात्मा की प्रीति, आत्मा-परमात्मा का ज्ञान। तो शुरू हुई थी बात के तुम इतनी ऊँचाई को छू सकते हो भगवान कहते हैं येन लब्ध्वा ना चापा रम, जिसको पाकर उससे कोई अपर चीज नहीं है। बड़ी चीज नहीं है। येन लब्ध्वा ना चापा रम लाभम मन्यते ना अधिकम् ततः ॥ यस्मिन स्थितो न दुखे ना गुरु नाती विचारे ॥ इस आत्म देव को पा ले। वो परम उदार है, परम समर्थ है, परम सुख रूप है, ज्ञान स्वरूप है, चैतन्य स्वरूप है। उसको मैं के रूप में जान लें । उसी की सत्ता से अन्तरकरण में जो प्रतिबिम्ब पड़ता है। चाँद असली चाँद की सत्ता से घड़े में चाँद दीखता है। तो घड़े का चाँद पानी हिलेगा तो हिलेगा, घड़ा टूटेगा तो मरेगा वो घड़े का चाँद। घड़े का चाँद मरेगा दीखता है लेकिन असलियत ज्यों की त्यों है। ऐसे ही ये शरीर जन्मते-मरते है लेकिन चिदाकाश परमात्मा सत्ता उनकी ज्यों की त्यों रहती है । ऐसे ही लीलावती को सरस्वती ने कहा के हे लीलावती तू कबतक रोयेगी और कबतक ये सबंध रहेंगें ? वास्तव में कोई मरता ही नहीं है। मरते-जन्मते आकृतियाँ हैं । जैसे पानी दरिया का वही का वही बुलबुले हुए, झाग हुई, भवर हुई और फिर मिटे बोले मर गए, बोले जन्मे, बोले मर गए। पानी खेल रहा है । ऐसे ही पाँच भुत इसमें खेल रहे हैं लीला हो रही है । और लीला के पीछे जिसकी सत्ता है वो सत है । जिसकी चेतनता है, जिसका आनंद है उस अपने परमेश्वर स्वभाव को जागृत करो।

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