LATEST NEWS

recent

सनातन संस्कृति के रक्षक : संत।

सनातन संस्कृति के रक्षक : संत। 

                   प्राचीनकाल से ही भारत भूमि पर अवतरित होते रहे अनेक संतों और महात्माओं ने न केवल इस देश को, बल्कि संपूर्ण विश्व को आध्यात्मिक चेतना से समृद्ध किया है । संतों की इस समृद्ध परम्परा ने, संवेदना की संस्कृति को जन्म देने और उसे विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है । स्वयं घोर कष्ट और अभावों को सहते हुए इन संतों ने, संपूर्ण मानव समाज को सन्मार्ग दिखाने और उसके उत्थान के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी | प्राचीन काल से ही, भारतवर्ष अपनी समृद्ध संस्कृति और उच्च मानवीय मूल्यों को संपूर्ण विश्व में स्थापित करने के लिए विख्यात रहा है । और उसकी इस छवि को प्रतिष्ठित करने में भारत भूमि में जन्मे संतों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है । यह सही है कि भारतवर्ष में समय-समय पर अवतरित हुए ये संत, अलग-अलग मत-पंथों से संबंधित थे, लेकिन उनके संदेशों के मूल में मानव मात्र का कल्याण ही निहित है । विभिन्न युगों और कालों में जन्मे संतों की भारत में समृद्ध परम्परा रही है और आज भी गतिशील है । परन्तु ये मानव समाज, समय समय पर संतों के लिए कुछ का कुछ कहता आया है ! कभी कहा : तुम तो ठहरे बाबा-बैरागी, तुम्हें सांसारिकता से क्या प्रयोजन ? तो कभी कहा कि जाओ, माला जपो और ईश्वर का ध्यान करो । अन्याय,शोषण और अत्याचार से तुम्हें क्या ? और भी न जाने क्या-क्या वचन सुनाते हैं संतों को ; सत्ता के मद में चूर ये लोग सत्य को ही घुड़की देते हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि ईश्वर का ध्यान केवल बैरागी को ही करना है, अन्य किसी को नहीं। निरंकुश सत्ताओं के इस युग में एक प्रश्न विचारणीय है कि अन्याय, शोषण और अत्याचार के उन्मूलन का प्रयोजन यदि संत को नहीं तो और किसे होना चाहिये ? क्या असंत के कुकृत्यों का विरोध किसी असंत ने किया है कभी ? क्या संतों के कर्तव्य असंतों द्वारा निर्धारित किये जायेंगे अब ? क्या संतों को उनकी मर्यादा असंत बताएँगे ? क्या संत के कर्तव्यों की असंतों द्वारा खींची गयी सीमा रेखा असंतों की निरंकुश भावना का प्रमाण नहीं है ? आपस में ही एक दूसरे पर अत्याचार करते रहने की यह कैसी अदम्य लालसा है मनुष्य की ? कष्टों के अन्धकूप में पड़े लोगों से मैं पूछती हूँ, क्या राग से वैराग्य तक की कठिन साधना के पश्चात….पोखर से समुद्र तक की यात्रा के पश्चात ….क्या किसी वैरागी को संवेदनहीन हो जाना चाहिये ? सृष्टिकर्ता की आराधना की उस स्थिति में पहुँचकर क्या संवेदनहीन हुआ जा सकता है? संत तो वो है जिन्हें लोग कहें; कि तुम निर्विकार बने रहो, अपने नेत्र मूँद लो पीड़ितों को देखकर … कान बन्द कर लो अपनी धरती माँ की चीत्कार सुनकर, पर वो संत अपना संतत्व कैसे छोड़ दे, कैसे रोते हुए को रोने दे, वो तो ऐसे हैं कि नम आँखों में उम्मीद की किरण जगा जाएं, रोते के चेहरे पर मुस्कान ले आयें और निरुत्साही के जीवन में उत्साह की ललक जगा जाएं ! लोग कहते हैं कि प्रेम तो सांसारिक मानव का विषय है, संतों का नहीं । पर मैं कहती हूँ कि प्रेम जब व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर व्यापक हो जाता है, तब वह संत का विषय हो जाता है। प्रेम को सतही समझना भूल होगी, वह कभी समाप्त नहीं होता …..वरन विस्तृत होता है …व्याप्त होता है । वैरागी व्यक्ति अन्य सांसारियों की अपेक्षा अधिक करुणा और संवेदना से भरा हुआ प्रेमी होता है…. उसका प्रेम विशिष्ट प्रेम है ..तभी वो वैरागी है अरागी नहीं । उसका राग सृष्टि मात्र के प्रति करुणा से भरा हुआ है तब वह जीवमात्र के कष्टों से भला निस्पृह कैसे रह सकता है ? परंतु कुछ संवेदनहीन और तथाकथित लोग, इस विचार से वाकिफ नहीं रखते कि जो समाज का हित चाहते हों, वो भला कैसे किसी का अहित सोच सकते हैं । भारत के विभिन्न संतों ने प्राणिमात्र के प्रेम में विह्वल होकर अपने-अपने तरीकों से सत्यम-शिवम-सुन्दरम की आराधना करते हुये जगत के कल्याण के लिये वैचारिक क्रांतियाँ की हैं। जो क्रांतिकारी नहीं वह संत कैसा ? और कुछ ऐसी ही क्रांति संत आसाराम बापू ने शुरू की धर्मांतरण के खिलाफ, विदेशी वस्तुओं के उपयोग के खिलाफ, कसाईघरों में बली चढ़ रही गायों के खिलाफ और भी अनगिनत सेवाओं की शुरुआत की, लेकिन ये सब उन विधर्मियों को रास नहीं आया और वहीँ से शुरू हुई झूठे और बेबुनियाद आरोपों की आंधी, जिन्होंने आज एक विश्व विख्यात संत को जेल पंहुचा दिया ! पर कहते हैं कि सांच को आंच नहीं, और झूठ को पैर नहीं ! और अंततः हो भी वही रहा है ! जो साधक वर्षों पहले जुड़े थे, उनकी आस्था और मजबूत होती चली गयी, और जो नए जुड़े थे, उनके विश्वास ने भी बापूजी का दामन नहीं छोड़ा और आज इस धर्म और सत्य की लड़ाई में वो पुरजोर के साथ बापूजी के समर्थन में खड़े हैं ! ज़रूरत है तो बस बदलते समय के साथ अपने विश्वास को बनाये रखने की, क्योंकि सच्चाई एक दिन सामने आती ही है ! जो संत परंपरा शुरू हुई थी, वो युग-युगांतर तक यूँ ही चलती चली जायेगी, आरोप-प्रत्यारोप लगाने वाले आये और चले गए, ऐसे ही आगे भी आयेंगे और चले जायेंगे, लेकिन न तो संतों का कभी कुछ बिगाड़ पाये और न ही हिन्दू – सनातन संस्कृति का !
सनातन संस्कृति के रक्षक : संत। Reviewed by Admin on अक्तूबर 16, 2014 Rating: 5

कोई टिप्पणी नहीं:

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

anandkrish16 के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.