दिपावली का आध्यात्मिक अर्थ क्या है ?

दिपावली का आध्यात्मिक अर्थ क्या है ? सत्-चित्-आनंद से उत्पन्न हुआ यह जीव अपने सत्-चित्त-आनंदस्वरूप को पा ले, इसलिए पर्वों की व्यवस्था है। इनमें दीपावली उत्सवों का एक गुच्छा है। भोले बाबा कहते हैं-प्रज्ञा दिवाली प्रिय पूजियेगा……. अर्थात् आपकी बुद्धि में आत्मा का प्रकाश आये, ऐसी तात्विक दिपावली मनाना। ऐहिक दिपावली का उद्देश्य यही है कि हम तात्त्विक दिपावली मनाने में भी लग जायें। दिपावली में बाहर के दीये जरूर जलायें, बाहर की मिठाई जरूर खायें-खिलायें, बाहर के वस्त्र-अलंकार जरूर पहने-पहनाएँ, बाहर का कचरा जरूर निकालें लेकिन भीतर का प्रकाश भी जगमगाएँ, भीतर का कचरा भी निकालें और यह काम प्रज्ञा दिवाली मनाने से ही होगा। दीपावली पर्व में 4 बातें होती हैं- कूड़ा-करकट निकालना, नयी चीज लाना, दीये जगमगाना और मिठाई खाना-खिलाना। दिपावली के दिनों में घर का कूड़ा-करकट निकाल कर उसे साफ-सुथरा करना स्वास्थ्य के लिए हितावह है। ऐसे ही ‘मैं देह हूँ… यह संसार सत्य है…. इसका गला दबोचूँ तो सुखी हो जाऊँगा…. इसका छीन-झपट लूँ तो सुखी हो जाऊँगा… इसको पटा लूँ तो सुखी हो जाऊँगा… इस प्रकार का जो हल्की, गंदी मान्यतारूपी कपट हृदय में पड़ा है, उसको निकालें। सत्य समान तप नहीं, झूठ समान नहीं पाप। जिसके हिरदे सत्य है, उसके हिरदे आप।। वैर, काम, क्रोध, ईर्ष्या-घृणा-द्वेष आदि गंदगी को अपने हृदयरूपी घर से निकालें। शांति, क्षमा, सत्संग, जप, तप, धारणा-ध्यान-समाधि आदि सुंदर चीजें अपने चित्त में धारण करें। दिपावली में लोग नयी चीजें लाते हैं न। कोई चाँदी की पायल लाते हैं तो कोई अँगूठी लाते हैं, कोई कपड़े लाते हैं तो कोई गहने लाते हैं तो कोई नयी गाड़ी लाते हैं। हम भी क्षमा, शांति आदि सदगुण अपने अंदर उभारने का संकल्प करें। इन दिनों प्रकाश किया जाता है। वर्षा ऋतु के कारण बिनजरूरी जीव-जंतु बढ़ जाते हैं, जो मानव के आहार-व्यवहार और जीवन में विघ्न डालते हैं। वर्षा-ऋतु के अंत का भी यही समय है। अतः दीये जलते हैं तो कुछ कीटाणु तेल की बू से नष्ट हो जाते हैं और कई कीट पतंग दीये की लौ में जलकर स्वाहा हो जाते हैं। दिपावली के दिनों में मधुर भोजन किया जाता है, क्योंकि इन दिनों पित्त प्रकोप बढ़ जाता है। पित्त के शमन के लिए मीठे, गरिष्ठ और चिकने पदार्थ हितकर होते हैं। दिपावली पर्व पर मिठाई खाओ-खिलाओ, किन्तु मिठाई खाने में इतने मशगूल न हो जाओ कि रोग का रूप ले ले। दूध की मावे की मिठाइयाँ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। यह दिपावली तो वर्ष में एक बार ही आती है और हम उत्साह से बहुत सारा परिश्रम करते हैं तब कहीं जाकर थोड़ा-सा सुख देकर चली जाती हैं, किंतु एक दिवाली ऐसी भी है, जिसे एक बार ठीक से मना लिया तो फिर उस दिपावली का आनंद, सुख और प्रकाश कम नहीं होता। सारे पर्व मनाने का फल यही है कि जीव अपने शिवस्वरूप को पा ले, अपनी आत्मदिपावली में आ जाये। जैसे, गिल्ली-डंडा खेलने वाला व्यक्ति गिल्ली को एक डंडा मारता है तो थोड़ी ऊपर उठती है। दूसरी बार डंडा मारता है तो गिल्ली गगनगामी हो जाती है। ऐसे ही उत्सव-पर्व मनाकर आप अपनी बुद्धिरूपी गिल्ली को ऊपर उठाओ और उसे ब्रह्मज्ञान का ऐसा डंडा मारो कि वह मोह-माया और काम-क्रोध आदि से पार होकर ब्रह्म-परमात्मा तक पहुँच जाये। किसी साधक ने प्रार्थना करते हुए कहा हैः मैंने जितने दीप जलाये, नियति पवन ने सभी बुझाये। मेरे तन-मन का श्रम हर ले, ऐसा दीपक तुम्हीं जला दो।। अपने जीवन में उजाला हो, दूसरों के जीवन में भी उजाला हो, व्यवहार की पवित्रता का उजाला हो, भावों तथा कर्मों की पवित्रता का उजाला हो और स्नेह व मधुरता की मिठाई हो, राग-द्वेष कचरे आदि को हृदयरूपी घर से निकाल दें और उसमें क्षमा, परोपकार आदि सदगुण भरें– यही दिपावली पर्व का उद्देश्य है। कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा…. शरीर से, वाणी से, मन से, इन्द्रियों से जो कुछ भी करें, उस परमात्मा के प्रसाद को उभारने के लिए करें तो फिर 365 दिनों में एक बार आने वाली दिपावली एक ही दिन की दिपावली नहीं रहेगी, आपकी हमारी दिपावली रोज बनी रहेगी। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

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