गृहस्थ का धर्म क्या है? (भगव्तपाद साँई श्री लीलाशाहजी महाराज)



गृहस्थ का धर्म क्या है?
(भगव्तपाद साँई श्री लीलाशाहजी महाराज)
                    गृहस्थ आश्रम खराब नहीं है, वह भी अच्छा है। वह एक वृक्ष के तने की भाँति है और उस वृक्ष की जड़ है ब्रह्मचर्य आश्रम तथा उसके फल-फूल हैं वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम। नयी पाठशालाएँ, अनाथाश्रम आदि खोलना अथवा संत-महात्माओं की सेवा के कार्य आदि जो भी पुण्यकर्म होते हैं, वे सब गृहस्थियों से ही होते हैं। ये सभी काम धन से ही होते हैं। धन कोई ऊपर से, आकाश से नहीं आता, बल्कि खेती, व्यापार आदि से ही प्राप्त किया जाता है। धन कमाना आवश्यक है किंतु वह सच्चाई से ही कमाना चाहिए। सेर बताकर छटाँक कम नहीं देना चाहिए। हृदय में किसी के लिए भी द्वेष, कपट अथवा ठगने की भावना नहीं रखनी चाहिए। व्यापार में लाभ तो अवश्य ही कमाना है किंतु जब ग्राहक आये, तब समझना चाहिए कि उस रूप में स्वयं भगवान आये हैं और उससे ठगी अथवा छल करना भगवान के साथ ठगी अथवा छल करना है। रामनाम बोलने से लाभ तो होता है लेकिन साथ में वाणी और कर्म में सच्चाई हो तो अमिट लाभ होता है। नाम-जप के साथ पेशे (व्यवसाय) तथा व्यवहार में भी सच्चाई होगी तो सोने पे सुहागा।
                         गृहस्थ को धन कमाने में बहुत समय व्यतीत करना पड़ता है, इसलिए वह सच्चे दिल से थोड़ा समय भी भजन करेगा तो भगवान स्वीकार कर लेंगे। पहले के लोग भी खाते-पीते थे, मिठास और खटास का अनुभव करते थे परंतु वे अपना जीवन सादगी से बिताते थे तथा मन व इऩ्द्रियों को वश में रखते थे। वे शास्त्र व संत-सम्मत व्यवहार करते थे। आज के लोगों को उनका अनुकरण करना चाहिए। अपने में से कमजोरियों को निकालने के लिए भगवान को प्रार्थना करें कि ʹहे प्रभु ! हमें शुभ बुद्धि दो, शक्ति दो, हम अपने कर्तव्य का पालन करें।ʹ जितना हो सके, उतना बुरे संग और बुरे कर्मों से बचना चाहिए। जो ऐसा करता है, वह अवश्य मोक्षपद प्राप्त करेगा। कोई सरकार की प्रशंसा भले ही न करे परंतु यदि चोरी, जुआ आदि कुकर्मों से बचा रहेगा तो उसे जेल नहीं जाना पड़ेगा। यही बात ईश्वर के संबंध में भी है। भगवान न्यायकारी हैं और सब कुछ देखते हैं। हम भले ही उनकी प्रशंसा करें किंतु यदि हम अपराध करेंगे तो उसका दंड हमें अवश्य भोगना पड़ेगा। इसलिए कुकर्मों से अवश्य बचना चाहिए। झूठ मत बोलो तथा ऐसा कोई काम न करो, जिसको करने से लज्जा आये। सदैव भलाई के काम करते रहो। दूसरों को शुभ कर्म करने के लिए साहस दो। यह भी भलाई का कार्य है। कर भला तो हो भला। भगवान तुम्हें शक्ति दें ताकि तुम शुभ कर्म करते रहो। संसार को स्वप्नवत समझो। यह सब परमात्मा का खेल है। संसार उसी का नाम है, जिस हम देखते हैं। संसार गुलाब का फूल नहीं, काँटा है। यदि भगवान को भुलाकर स्वच्छंद होकर चलोगे यानी बुरा संकल्प, बुरे कर्म करोगे तो वह चुभेगा अर्थात् तुम्हें दुःखी बनायेगा किंतु यदि देह, मन तथा इन्द्रियों पर संयम रखोगे और भगवान का स्मरण करोगे तो सच्चा आनंद प्राप्त करोगे।

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