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कैसे होता है पाप का संक्रमण?

कैसे होता है पाप का संक्रमण? 'देवलस्मृति' में आता हैं की पापी के साथ बातचीत करने से, उसके स्पर्श करने से उसकी श्वास लगने से उसके साथ चलने, बैठने, खाने से एवं उसके लिए यजन (यज्ञ, पूजा-अर्चना आदि कार्य) करने से तथा उसे पढ़ाने से अथवा उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने से पाप दुसरे मनुष्य को संक्रमित हो जाता है | संलापस्पर्शनिःश्वाससहयान ाशनासनात् । याजनाध्यापनाधौनात पापं संक्रमते नृणाम् ॥ (गरुड पुराण: २.६५ ,देवलस्मृति : ३३ ) दुसरो को सताना ,निर्दोष प्राणियों को मारना ,झूठ बोलना ,हिंसा ,चोरी , व्यभिचार आदि कई प्रकार के पाप शास्त्रों में बताये गये हैं | उनमें से परनिंदा को ‘महापाप ‘ माना गया हैं | 'स्कंद पुराण' में आता है परनिन्दा महापापं परनिन्दा महाभयम् । परनिन्दा महददुःखं न तस्याः पातकं परम् ॥ 'परनिंदा महान पाप है ,परनिंदा महान भय है, परनिंदा महान दुःख है और परनिंदा से बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है | (ब्रा .चा .मा : ४.२५ ) इसीलिए संत कबीरदासजी ने भी कहा है : कबीरा निंदक ना मिलो, पापी मिलो हजार । एक निंदक के माथे पर लाख पापिन को भार || पूर्वकाल में शतघ्नु नामक राजा की धर्मपत्नी शैव्या का शास्त्रवचनों में ढ़ृढ़ विश्वास था | एक बार कार्तिक पूर्णिमा को उपवास करके दोनों ने गंगा जी में स्नान किया । बाहर आने पर राजा का पुराना गुरुभाई जो निंदक बन चुका था, वह आता हुआ दिखा | रानी जानती थी कि शास्त्रों में आता है कि "किसी पापी के दर्शन से भी पाप लगता है" | तो वार्तालाप होने से तो पाप की गिनती ही नहीं है । गलती से अगर निंदक दिख जाय तो शास्रों में इसके प्रायश्चित के लिए जाता है कि सूर्य, गंगाजी, सद्गुरु आदि के दर्शन कर लेने चाहिए | अत: रानी उससे बिना बातचीत किये सूर्यदेव का दर्शन करके आगे निकल गयी | केवल तीर्थ में ही नही, बल्कि किसी भी देश, काल, परिस्थिति में पापी व्यक्ति के संग से हानि हो जाती है | यह जानते हुए भी राजा ने उस व्यक्ति से बातचीत की | इससे राजा में उस पापी व्यक्ति के पाप का संक्रमण हो गया | समय आने पर राजा की मृत्यु हुई | महारानी शैव्या भी पति की चिता के साथ सती हो गयी | दुसरे जन्म में रानी काशीनरेश की कन्या हुई और पाप के संक्रमण के कारण राजा कुत्ता बना | रानी को पूर्वजन्म का वृतांत याद था | उसने अपने पूर्वजन्म के पति को याद दिलाया कि पापी से बातचीत करने के कारण से उसको कुतों की योनि प्राप्त हुई है | कुत्ते को पूर्वजन्म का स्मरण हो आया | उसने खाना पीना छोड दिया और शीध्र ही प्राण त्याग दिया | किंतु अभी पाप से छुटकारा नहीं हुआ था, वह सियार बन गया | उसकी पूर्व की पत्नी ने फिर उसे पुराने पापो को स्मरण कराया । राजा ने सियार का शरीर भी छोड़ दिया | फिर उसे क्रमशः भेड़िया, गीध, कौआ के बाद मयूर की योनि प्राप्त हुई | उसी समय राजा जनक ने अश्वमेध यज्ञ का अनुष्टान किया था | वह कन्या मयूर को लेकर वहाँ गयी । यज्ञ में पधारे संत-महापुरुषों की दृष्टि पड़ने से राजा की सद्गति हुई और वह राजा जनक का पुत्र बना | निंदक से एक बार बातचीत करने पर कितना भारी पाप लगता है यह बात इस पौराणिक प्रसंग से स्पष्ट है | तो फिर विचारणीय है की मिडिया जो संत-निंदा करता है उसे सुनने व देखने वाले का कितना अहित होता होगा ! एक बार निंदा सुनने से उस समय तो व्यक्ति को एहसास नहीं होता परंतु अवचेतन मन में वे संस्कार घर कर जाते हैं और व्यक्ति को नीच योनियों की यात्रा कराते हैं और आदरपूर्वक महापुरुषों का सत्संग सुनना व जीवन में उतारना ७-७ पीढ़ियाँ तार देता है | अत: निंदा करने वाले लोगों की बातों की उपेक्षा कर दें | जो न्यूज़ चैनल, अखबार आदि भारतीय संस्कृति और साधू-संतो के बारे में गलत दिखाते या छापते हैं, उनको बंद करके इनके द्वारा होनेवाले संक्रमण से हम अपने को सुरक्षित करें |
कैसे होता है पाप का संक्रमण? Reviewed by Admin on अक्तूबर 08, 2014 Rating: 5

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