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प्रेमावतारः श्री कृष्ण दिव्य चरित्र।

प्रेमावतारः श्री कृष्ण दिव्य चरित्र। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- “हे गोपियो ! जाओ, अपने पतियों की सेवा करो। इधर क्या रखा है ?” गोपीः “तुम्हारा चिंतन करते-करते हम कृष्ण बन जायेंगे और तुम हमारा चिंतन करते करते हो तो तुम गोपी बन जाओगे। फिर तुम्हें पता चलेगा कि विरह क्या होता है। फिर तुम आओगे तो हम भी उपदेश देंगे कि ‘जाओ, बच्चों को पालो-पोषो। सास-ससुर की सेवा करो। तुम्हारा यह कर्त्तव्य है… वह कर्त्तव्य है… हमारे दिन आयेंगे।’ श्रीकृष्णः “तुम्हारे दिन आयें चाहे न आयें, किंतु अभी तो जाओ !” गोपीः “तुम यह लौकिक धर्म का उपदेश दे रहे हो परंतु लौकिक ने तो अलौकिक सुख का अमृतपान करा दिया है, हृदय का सुख दे दिया है।” श्रीकृष्णः “अभी तो मुझे चित्तचोर कह रही थी और अभी बोलती हो कि हृदय का सुख दे दिया है। बोलने का कुछ ठिकाना भी है ?” गोपीः “ठिकाने सारे माया में हैं। तुम तो मायापति हो जो हमें भी बेठिकाने कर दिया। इसलिए बोल दिया तो माफ करना, केशव ! बुरा मत मानना। हम क्षमा चाहती हैं किंतु तुमने तो हमारा दिल ही चुरा लिया है।” इन्हीं गोपियों को जब उद्धव परमात्मज्ञान की बातें समझाने जाते हैं तो वे कहती हैं- “उद्धव ! तुम्हारा उपदेश हमने सुन लिया परंतु हमसे ये सब नहीं होगा, क्योंकि दिल एक ही था उसे भी वह नटखट ले गया।” उद्ववः “वापस ले आयें ?” गोपीः “नहीं ! उन्हीं के पास रहने दो।” यह मोहब्बत की बातें है उद्धव, बंदगी अपने बस की नही है। यहाँ सिर देकर होते हैं सौदे, आशिकी इतनी सस्ती नहीं है।। प्रेमवालों ने कब किससे पूछा ? किसको पूजूँ बता मेरे उद्धव। यहाँ दम-दम पर होते हैं सिजदे, सिर घुमाने की फुरसत नहीं है।। कौन क्या कहता है, कौन क्या करता है, यह देखने की फुरसत नहीं है। कैसा है गोपियों का दिव्य प्रेम ! उद्धव ने पूछाः “पगलियो ! जब तुम श्रीकृष्ण के बिना नहीं रह सकती हो, बिलख रही हो और तुम्हारे प्राणनाथ मथुरा में बैठे हैं तो तुम मर क्यों नहीं जाती हो ? अभी तक जीवित कैसे हो ?” गोपियाँ- “उद्धवजी ! यदि हम श्रीकृष्ण की याद में मर जाएँगे तो लोग लाँछन लगायेंगे कि ‘कृष्ण की याद में बेचारी गोपियाँ मर गयीं।’ हमारे प्रेमास्पद की इज्जत हमारी इज्जत है, इसीलिए हमारा शरीर अभी तक टिका है।” उद्धवः “तुम्हारी ऐसी स्थिति देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है ! मैं अभी जाकर श्रीकृष्ण को प्रार्थना करके समझा-बुझाकर भेजता हूँ।” गोपियाँ- “ऐसा मत करना। वे अगर वहाँ सुखी हैं तो उनकी खुशी में हमारी खुशी है।” प्रेमास्पद को दुःखी करके प्रेमी कभी सुखी नहीं होना चाहता। बाहर से प्रेमी और प्रेमास्पद दिखते दो हैं किंतु भीतर से एक हो जाते हैं। प्रेम ईमानदारी सिखाता है जबकि स्वार्थ बेईमानी सिखाता है। प्रेम सहजता और सरलता सिखाता है जबकि स्वार्थ कपट और कुटिलता सिखाता है। आज का मनुष्य बाहर से सुखी व चतुर, पर भीतर से अशांत व बेईमान बन गया है। वह ईमानदारी से न रो सकता है न हँस सकता है, न नाच सकता है, न कह सकता है और न ही ईमानदारी से सुन सकता है। श्रीकृष्ण प्रेमस्वरूप हैं। आप उन्हीं से प्रार्थना करना कि ‘हे भगवान ! हमें आज जन्माष्टमी के दिन निर्दोषता सिखा दो। हँसना आये तो हम भरपेट हँस लें, रोना आये तो हम रो लें, तेरे लिए नाचने का मन हो तो हम नाच लें, गीत गाना आये तो हम गा लें…. किंतु हे ईश्वर ! हम ‘हम’ न बचें, बस। हमारी जो सामाजिक मान्यताएँ हैं, धारणाएँ हैं, वे न बचें। हे विश्वेश्वर ! हे गोवर्धनधारी ! हे गोपाल ! हे नंदनंदन ! हे भक्तवत्सल ! हे गिरधारी ! हे मुरलीधर ! हे गोविन्द ! हे कन्हैया ! बस, तू इतनी कृपा करना कि हम ‘हम’ न बचें, तू ही तू रह जाये। कृष्ण कन्हैया…. बंसी बजैया… वृंदावन की कुंजगलिन में…. साधक के दिल की गलियों में…ठुमक ठुमक रास रचैया….।’ वह अभी भी, इस समय यहाँ भी है। वह आपकी भक्ति, आपके प्रेम, आपकी विवशता को भी देख रहा है। वह अन्तर्यामीरूप से सदा आपके साथ है। शर्त यही है आप भीतर डूबते जाओ…. आप जितना भीतर डूबोगे, उससे प्रेम करोगे, निर्दोष बनोगे, उसकी पुकार करोगे उतने ही बाहर के लोगों की नजर में आप पागल दिखोगे, किन्तु भीतर आप सचमुच में ‘गल′ को पा रहे होंगे। गोपियों ने भीतरी ‘गल′ को पा लिया था। उद्धवजी आये थे ब्रज में गोपियों को समझाने के लिए, किंतु श्रीकृष्ण में उनकी तन्मयता देखकर वे स्वयं ही प्रेम और आनंद से भर गये और कह उठेः एताः परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढभावाः। वाञ्छन्ति यद् भवभियो मुनयो वयं च किं ब्रह्मजन्मभिरनन्तकथारसस्य।। क्वेमाः स्त्रियो वनचरीर्व्यभिचारदुष्टाः कृष्णे क्व चैष परमात्मनि रूढभावः। नन्वीश्वरोऽनुभजतोऽविदुषोऽपि साक्षाच्छ्रेयस्तनोत्यगदराज इवोपयुक्तः।। ‘इस धरती पर केवल इन गोपियों का ही शरीर धारण करना सार्थक है, क्योंकि ये सर्वात्मा भगवान श्रीकृष्ण के परम प्रेममय दिव्य महाभाव में स्थित हो गयी हैं। प्रेम की यह ऊँची-से-ऊँची स्थिति संसार से भय-भीत मुमुक्षुजनों के लिए ही नहीं अपितु बड़े-बड़े मुनियों, मुक्त पुरूषों तथा हम भक्तजनों के लिए भी अभी वांछनीय ही हैं। हमें इसकी प्राप्ति नहीं हो सकी। सत्य है, जिन्हें भगवान श्रीकृष्ण की लीला-कथा के रस का चसका लग गया है, उन्हें कुलीनता की, द्विजातिसमुचित संस्कार की और बड़े-बड़े यज्ञ-यागों में दीक्षित होने की क्या आवश्यकता है ? अथवा, यदि भगवान की कथा का रस नहीं मिला, उसमें रूचि नहीं हुई तो अनेक महाकल्पों तक बार-बार ब्रह्म होने से भी क्या लाभ ? कहाँ तो ये वनचरी, आचार ज्ञान जाति से हीन गाँव की गँवार ग्वालिनें और कहाँ सच्चिदानंदघन भगवान श्रीकृष्ण में उनका यह अनन्य परम प्रेम ! अहो, धन्य है ! धन्य है ! इससे सिद्ध होता है कि यदि कोई भगवान के स्वरूप और रहस्य को न जानकर भी उनसे प्रेम करे, उनका भजन करे तो वे स्वयं अपनी शक्ति से, अपनी कृपा से उसका परम कल्याण कर देते हैं। ठीक वैसे ही जैसे, कोई अनजाने में भी अमृत पी ले तो वह अमृत अपनी गुणशक्ति से ही पीने वाले को अमर बना देता है।’ (श्रीमद् भगवद् गीताः 10.47.58.59)
प्रेमावतारः श्री कृष्ण दिव्य चरित्र। Reviewed by Admin on सितंबर 22, 2014 Rating: 5

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