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सतगुरु वचन । - ८

मन में भय, अशांति, उद्वेग और विषाद को स्थान मत दो। सदा शांत, निर्भय और प्रसन्न रहने का अभ्यास करो। अपनी महिमा में जागो। खामखाह क्यों दीन होते हो? ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ पानी दो घटकों से बना है:हाइड्रोजन और ऑक्सीजन। ये दोनों वातावरण में हमेशा उपस्थित हैं फिर भी दोनों, मिलकर पानी बनकर बरसता नहीं। वैज्ञानिक कहते हैं:इन दोनों के मिलकर पानी बनने में एक ‘केटेलिटिक एजेन्टङ्क की जरूरत पड़ती है और वह एजेन्ट है एक विद्युत प्रवाह। पानी का यह कोई तीसरा घटक नहीं है। फिर भी उसकी उपस्थिति अनिवार्य है। उसी प्रकार जीव को उसके ब्रह्मस्वरूप का अनुभव करने में सद्गुरू की उपस्थिति चाहिए। सद्गुरू स्वयं तो अकत्र्ता है। उनके सान्निध्य मात्र से जीव की जड़ता बिखरने लगती है और सच्चिदानन्द स्वरूप प्रगट होने लगता है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ करोड़ों दुःख रूपी कीटाणु तुम्हारे आस-पास क्यों न घूमते रहें ,पर कुछ चिंता न करो । जब तक तुम्हारा मन कमजोर नही होता । तब तक उनकी हिम्मत नही कि वे तुम पर हमला करे । यह एक बड़ा सत्य है कि बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मरण । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ अपने आप को सदैव पूर्ण शांत और आनंद मग्न रखो । चाहे जैसी घटना हो उसमे व्याघात नही होना चाहिये। भूख-प्यास, रोग, दुःख, अपमान और मृत्यु । सदैव प्रसन्नचित्त और शांत रहो क्योंकि तुम परमात्मा के अंश हो, परम तत्व हो। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ पृथिवी नहीं जल भी नहीं,नहीं अग्नि तू नहीं है पवन। आकाश भी तू है नहीं,तू नित्य है चैतन्यघन।। इन पाँचों का साक्षी सदा,निर्लेप है तू सर्वपर। निजरूप को पहिचानकर,हो जा अजय!हो जा अमर!! ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ जागो.... उठो.... अपने भीतर सोये हुए निश्चयबल को जगाओ। सर्वदेश, सर्वकाल में सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करो। आत्मा में अथाह सामर्थ्य है। अपने को दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो तुम्हें ऊपर उठा सके। अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये तो त्रिलोकी में ऐसी कोई हस्ती नहीं जो तुम्हें दबा सके। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ यदि तुमने शरीर के साथ अहंबुद्धि की तो तुममें भय व्याप्त हो ही जायेगा, क्योंकि शरीर की मृत्यु निश्चित है। उसका परिवर्तन अवश्यंभावी है। उसको तो स्वयं ब्रह्माजी भी नहीं रोक सकते। परन्तु यदि तुमने अपने आत्मस्वरूप को जान लिया, स्वरूप में तुम्हारी निष्ठा हो गयी तो तुम निर्भय हो गये, क्योंकि स्वरूप की मृत्यु कभी होती नहीं। मौत भी उससे डरती है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ सुख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा तो दुःख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा। पर्दे को क्या? कई फिल्में और उनके दृश्य आये और चले गये, पर्दा अपनी महिमा में स्थित है। तुम तो छाती ठोककर कहोः ‘अनुकूलता या प्रतिकूलता, सुख या दुःख जिसे आना हो आये और जाय। मुझे क्या...?’ किसी भी दृश्य को सच्चा मत मानो। तुम दृष्टा बनकर देखते रहो, अपनी महिमा में मस्त रहो। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ बाहर कैसी भी घटना घटी हो, चाहे वह कितनी भी प्रतिकूल लगती हो, परन्तु तुम्हें उससे खिन्न होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं, क्योंकि अन्ततोगत्वा होती वह तुम्हारे लाभ के लिए ही है। तुम यदि अपने-आपमें रहो तो तुम्हें मिला हुआ शाप भी तुम्हारे लिए वरदान का काम करेगा। अर्जुन को ऊर्वशी ने वर्ष भर नपुंसक रहने का शाप दिया था परन्तु वह भी अज्ञातवास के समय अर्जुन के लिए वरदान बन गया। प्रतिकूलता से भय मत करो। सदा शांत और निर्भय रहो। भयानक दृश्य (द्वैत) केवल स्वप्नमात्र है, डरो मत। चिन्ता, भय, शोक, व्यग्रता और व्यथा को दूर फेंक दो। उधर कतई ध्यान मत दो। सारी शक्ति निर्भयता से प्राप्त होती है, इसलिए बिल्कुल निर्भय हो जाओ। फिर तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ यह पक्की गांठ बांध लो कि जो कुछ हो रहा है, चाहे अभी तुम्हारी समझ में न आये और बुद्धि स्वीकार न करे तो भी वह परमात्मा का मंगलमय विधान है। वह तुम्हारे मंगल के लिये ही सब करता है। परम मंगल करने वाले परमात्मा को बार-बार धन्यवाद देते जाओ, प्यार करते जाओ और अपनी नैया जीवनदाता की ओर बढाते जाओ। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ मैं देह हूँ फाँसी महा, इस पाप में जकड़ा गया । चिरकाल तक फिरता रहा, जन्मा किया फिर मर गया ।। ‘मैं बोध हूँ 'ज्ञानास्त्र ले, अज्ञान का दे काट सर । स्वछन्द हो, निद्र्वन्द्व हो, आनन्द कर सुख से विचर।। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ जिनकी बहुत तड़प होती है,प्यास होती है वे इसी जन्म में गुरु के गुरुतत्व को पूर्ण रूप से पाने का इरादा कर लेते हैं ।जितना-जितना आप गुरुतत्व को पाने का इरादा करोगे,उतना-उतनाआप अपनी बाहर की आसक्ति और गंदी आदतें छोड़ने में सफल हो जाओगे । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ साधक यदि अभ्यास के मार्ग पर उसी प्रकार आगे बढ़ता जाये, जिस प्रकार प्रारम्भ में इस मार्ग पर चलने के लिए उत्साहपूर्वक कदम रखा था, तो आयुरूपी सूर्य अस्त होने से पहले जीवनरूपी दिन रहते ही अवश्य 'सोऽहम् सिद्धि' के स्थान तक पहुँच जाये | ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ दुःख का पहाड़ गिरता हो और तुम परमात्मा में डट जाओ तो वह पहाड़ रास्ता बदले बिना नहीं रह सकता। दुःख का पहाड़ प्रकृति की चीज है। तुम परमात्मा में स्थित हो तो प्रकृति परमात्मा के खिलाफ कभी कदम नहीं उठाती। ध्यान में जब परमात्म-स्वरूप में गोता मारो तो भय, चिन्ता, शोक, मुसीबत ये सब काफूर हो जाते हैं। जैसे टॉर्च का प्रकाश पड़ते ही ठूँठे में दिखता हुआ चोर भाग जाता है वैसे ही आत्मविचार करने से, आत्म-भाव में आने मात्र से भय, शोक, चिन्ता, मुसीबत, पापरूपी चोर पलायन हो जाते हैं। आत्म-ध्यान में गोता लगाने से कई जन्मों के कर्म कटने लगते हैं। अभी तो लगेगा कि थोड़ी शान्ति मिली, मन पवित्र हुआ लेकिन कितना अमाप लाभ हुआ, कितना कल्याण हुआ इसकी तुम कल्पना तक नहीं कर सकते। आत्म ध्यान की युक्ति आ गयी तो कभी भी विकट परिस्थितियों के समय ध्यान में गोता मार सकते हो। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
सतगुरु वचन । - ८ Reviewed by Admin on सितंबर 24, 2014 Rating: 5

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