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परमात्मा का स्वभाव, स्वरूप और गुण क्या?

परमात्मा का स्वभाव, स्वरूप और गुण क्या? आप परमात्मा का स्वभाव जान लो, स्वरूप जान लो। बाप-रे-बाप!क्या मंगल समाचार है!क्या ऊँची खबर है!भगवान के गुणों का ज्ञान उपासना में काम आता है। भगवान के स्वभाव का ज्ञान शरणागति में काम आता है और भगवान के स्वरूप का ज्ञान भगवान से एकाकार होने में काम आता है। भगवान का वास्तविक स्वरूप क्या है यह जानोगे तो फिर आप भगवान से अलग नहीं रह पाओगे। भगवान का स्वभाव जानोगे तो आप उनकी शरण हुए बिना रूक नहीं सकते। भगवान के गुणों का ध्यान सुन लोगे, जान लोगे तो आप उनकी उपासना किये बिना नहीं रह सकते। अदभुत हैं भगवान के गुण!अदभुत है भगवान का सामर्थ्य!अदभुत है भगवान की दूरदर्शिता और अदभुत है भगवान की सुवव्यवस्था!छोटी मति से भले कभी कभार कहें कि'यह अन्याय हो गया, यह जुल्म हो गया, यह अच्छा नहीं हुआ'लेकिन जब भगवान की वह लीला और संविधान देखते हैं तो कह उठते हैं कि'वाह-रे-वाह प्रभु!क्या आपकी व्यवस्था है!करूणा-वरूणा के साथ सबकी उन्नति के कारण का क्या आपका स्वभाव है!' अजब राज है मौहब्बत के फसाने का। जिसको जितना आता है, उतना ही गाये चला जाता है।। एक आसाराम के शरीर में हजार-हजार जिह्वाएँ हों और ऐसे हजार-हजार शरीर मिल जायें, फिर भी आपके गुणों का, स्वभाव का, सामर्थ्य का वर्णन नहीं कर पायेंगे, नहीं कर सकते। जितना थोड़ा कुछ करते हैं उसी में आपकी करूणा-वरूणा और रस तथा प्रकाश पाकर तृप्त हो जाते हैं। प्रभु जी!प्यारे जी!मेरे जी!..... भगवान कैसे?आप जैसा चाहते हो वैसे!भगवान की अपनी कोई जाति नहीं। भगवान का अपना कोई रूप रंग नहीं। जिस रूप रंग से आप चाहते हो, उसी रूप-रंग से वे समर्थ प्रकट हो जाते हैं।अहं भक्तपराधीनः।ॐ..... ॐ... शांति!बोलोगे तो शांति भरे देंगे।'अच्युत, आनंद....!'तो आनंद उभार देंगे।'अच्युत, गोविंद....'– इन नामों से पावन होते जाओगे। भगवान का स्वरूप क्या है!भगवान के स्वरूप का वर्णन तो भगवान भी नहीं कर सकते तो हम तुम क्या कर सकते हैं!फिर भी थोड़ा-थोड़ा वर्णन करके काम बना लेते हैं हम। भगवान का स्वरूप क्या है?बोलेः'सोने का स्वरूप क्या है?'सोने का कंगन ले आये, अँगूठी ले आये, हार ले आये, चूड़ियाँ ले आये। ये तो गहने हैं लेकिन इनकी मूल धातु सोना है। मूल धातु को समझ लो। गहने अनेक प्रकार के लेकिन मूल धातु एक ही। सत्स्वरूप, चेतनस्वरूप, आनंदस्वरूप चिदघन सारे ब्रह्माण्डों में ठसाठस भरपूर – यह भगवान का स्वरूप है। भगवान का स्वभाव क्या है?भगवान का स्वभाव है जो जिस रूप में पुकारे, जिस रूप में प्रेम करे, जिस रूप में चाहे उस रूप में उसके आगे प्रकट हो जाते हैं। भक्तवत्सलता भगवान का स्वभाव है। भक्तपराधीनता भगवान का स्वभाव है। अपने को बेचकर भी भक्त का काम करते हैं। अपने को बँधवाकर भी भक्त को खुशी देते हैं। घोड़ागाड़ी चलाकर भी भक्त का काम होता है तो कर लेंगे। भक्त के घोड़ों की मालिशक करनी होती है तो भी कर लेंगे। भक्तानी के जूठे बेर खाकर भी उसका मंगल होता है तो वे कर लेते हैं और ताड़का वध करने से भी गुरू की सेवा हो जाती है तो वह भी कर लेंगे!'हाय सीते!कहाँ गयी?हाय सीते!....'– ऐसा करने से भी भक्तों की सूझबूझ बढ़ती है तो वे करलेंगे। यह किस चीज का पेड़ है?मोसम्बी मिली तो बोलेः'मोसम्बी का पेड़ है।'आम मिले तो बोलेः'आम का पेड़ है।'पपीता मिला, नारियल मिला, जो फल मिला, बोलेः'इसी का पेड़ है।'लेकिन कोई ऐसा पेड़ कि जो जैसा फल माँगे वैसा फल उसे दे तो उसको क्या बोलोगे?आम का बोलोगे, चीकू का बोलोगे, नारियल का बोलोगे, पपीते का बोलोगे कि अनार का बोलोगे?उसको कल्पतरू बोलोगे। जो जैसी कल्पना करे उसी प्रकार का फल दे दे, उसे'कल्पतरू'कहते हैं। तो भगवान कैसे हैं?भगवान का स्वभाव क्या है?भक्तवत्सल, कल्पतरू!भगवान का स्वरूप क्या है?सर्वेश्वर, सत्-चित्-आनंद, चिदघन, सर्व ब्रह्माण्डों में ओतप्रोत-भरपूर!जैसे सूत के चित्र में सूत की ही माला, सूत के ही दाने और चप्पल भी सूत की, पैर भी सूत के, वक्षस्थल भी सूत का तो जो कपड़े पहने हैं वे भी सूत के। शक्कर के खिलौनों में लाट साहब भी शक्कर का तो चपरासी भी शक्कर का। हाथी भी शक्कर का तो उस पर बैठा राजा भी शक्कर का। अब कहीं राजा दिखता है, कहीं चपरासी दिखता है तो कहीं प्रजा दिखती है लेकिन है शक्कर-ही-शक्कर। ऐसे ही भगवान का स्वरूप क्या है?बोलेः सत्-चित्-आनंद, चिदघन, विभु, व्याप्त, सर्वत्र। भगवान का स्वभाव क्या है?भक्तवत्सल। भक्त जिस रूप में जिस भाव में उन्हें पुकारे वे प्रकट हो जाते हैं क्योंकि वे कल्पतरू हैं। भगवान का गुण क्या है?भगवान का गुण हैः सुहृदता। मित्र तो बदले में कुछ पाने के भाव से हमारी मदद करेगा लेकिन भगवान कोई बदले की भावना से नहीं करते। प्राणिमात्र के परम सुहृद परमात्मा हैं। सुहृदता भगवान का गुण है।सुहृदं सर्वभूतानाम्।'मैं प्राणिमात्र का सुहृद हूँ।'ज्ञात्वा मां शांतिमृच्छति।'ऐसा मुझे जाननेवाला शांति को पाता है।'और शांति से बड़ा कोई सुख नहीं।अशांतस्य कुतः सुखम्।अशांत को सुख कहाँ!और शांतात्मा को दुःख कहाँ!आप सुबह उठिये और मन-ही-मन कहियेः'भगवान!आपका स्वरूप है सर्वव्यापक। सारी इन्द्रियाँ, सारे मन आप ही में आराम पाते हैं और उनको आप ही पालते हो, आप गोपाल भी हो। आप राधारमण हो।'राधा'.... उलटा दो तो'धारा'। चित्त का फुरना, चित्त की कलना जिसकी सत्ता से रमण करती है, वह आप राधारमण भी हो। आप अच्युत भी हो। सारे पद च्युत हो जाते हैं, सारे शरीर च्युत हो जाते हैं, स्वर्गलोक भी च्युत हो जाता है, ब्रह्मलोक भी च्युत हो जाता है, आकृतियाँ च्युत हो जाती हैं फिर भी हे प्रभु!आप च्युत नहीं होते हो – आप अच्युत हो। आप केशव हो।'क'माने ब्रह्मा का आत्मा आप ही हो।'श'माने शिव का आत्मा भी आप हो।'व'माने विष्णु का आत्मा भी आप लो और मेरा आत्मा भी आप हो। आपका स्वरूप तो थोड़ा-थोड़ा जानते हैं। प्रभु! आप ऐसे हो और मेरे अपने अंतर्यामी होकर बैठे हो। आपका स्वभाव भक्तवत्सल है। जिसने जिस भाव से पुकारा...भावग्रही जनार्दनः।'भाव को ही ग्रहण करने वाले हो जनार्दन!''ॐ....ॐ.... आनंद!'बोलेंगे तो आनंद दोगे।'ॐ....ॐ.... शांति!'तो शांति दोगे।'ॐ....ॐ.... दुश्मन का ऐसा हो, वैसा हो....'खुराफात बोलेंगे तो खुराफात दोगे और प्रेमस्वरूप बोलेंगे तो प्रेम दोगे। आपका स्वभाव है भक्तवत्सल, कल्पतरू।'और महिलाएँ हैं तो प्रभु को कामधेनु मान लो। कल्पतरू के आगे जो कल्पना करो वह पूरी होती है। कामधेनु के आगे जो कामना करो वह देती है।'आप कल्पतरू।'और महिलाएँ हैं तो प्रभु को कामधेनु मान लो। कल्पतरू के आगे जो कल्पना करो वह पूरी होती है। कामधेनु के आगे जो कामना करो वह देती है।'आप कल्पतरू भी हो, कामधेनु भी हो, गुरूरूप भी हो, साधकरूप भी हो, सुहृदरूप भी हो, मित्ररूप भी हो – सभी रूपों में आप हो सारे रूपों के बाद भी आप ही रह जाते हो, अच्युत हो। ॐ आनंद!ॐ अच्युत!ॐ गोविंद!'– इस प्रकार का सुबह आरम्भिक मधुमय चिंतन करो तो आपका सारा दिन मधुमय होने लगेगा। 'आपका गुण क्या है?मित्र देकर उत्साह देते हो और शत्रु, विरोधी देकर अहंकार को मिटाते हो, सावधानी बढ़ाते हो, आसक्ति मिटाते हो। प्राणिमात्र के सुहृद हो। हो न!'– एक हाथ अपना और एक ठाकुरजी का मानकर अपने ही दायें हाथ से बायाँ हाथ मिलाओ। भगवान की सुहृदता, भगवान की भक्तवत्सलता और भगवान का विभु स्वभाव याद करो तो फिर देर-सवेर पता चलेगा कि भगवान आपके आत्मा होकर बैठे हैं। जो ठाकुरू सद सदा हजूरे। ता कउ अंधा जानत दूरे।। 'आप दूर नहीं, दुर्लभ नहीं।जय जगदीश हरे....जगत के ईश आप।भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करें।आपके स्वभाव का, आपके स्वरूप का, आपके गुण का चिंतन करते हैं तो तुरंत मन की ग्लानि, मलिनता, दीनता-हीनता चली जाती है।'आप जगत का चिंतन करोगे और जगत में प्रीति करोगे तो जगत आपको कामी बनायेगा, क्रोधी बनायेगा, लोभी बनायेगा, मोही बनायेगा, चिंतित बनायेगा, विलासी बनायेगा, विकारी बनायेगा और जन्म-मरण के धक्कों में धकेलता रहेगा और प्रभु का चिंतन करोगे को प्रभु का चिंतन आपको विभु बना देगा, सुहृद बना देगा, कल्पतरू बना देगा। जो महात्मा ऐसा चिंतन करते हैं, वे भक्तों के कल्पतरू हो जाते हैं। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
परमात्मा का स्वभाव, स्वरूप और गुण क्या? Reviewed by Admin on सितंबर 08, 2014 Rating: 5

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