मुक्ति के कितने प्रकार होते हैँ?


मुक्ति पांच प्रकार की होती है :-
[ १ ] सालोक्य :- इस मुक्ति से भगवद – धाम की प्राप्ति होती है। वहाँ सुख – दुख से अतीत अनंत आनंद है , और अनंत काल के लिए है।
[ २ ] सार्ष्टि: –यह सालोक्य से आगे की मुक्ति है। इसमें भक्त को परम धाम में भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता है। सम्पूर्ण ऐश्वर्य , धर्म , यश , श्री , ज्ञान और वैराग्य ये सभी भक्त को प्राप्त हो जाते हैं। केवल संसार की उत्पत्ति व संहार करना भगवान के आधीन रहता है , वह भक्त नहीं कर सकता।
[ ३ ] सामीप्य: -यह सार्ष्टि के आगे की मुक्ति है। इसमें भक्त भगवान के समीप रहता है और भगवान के माता – पिता , सखा , पुत्र , स्त्री आदि होकर रहता है।
[ ४ ] सारूप्य: –यह सामीप्य के आगे की मुक्ति है। इसमें भक्त का रूप भगवान के समान हो जाता है। भगवान के तीन चिन्हों [ श्री वत्स , भृगु - लता , और कोस्तुभ - मनी ] को छोड़कर शेष शंख , चक्र , गदा और पद्म आदि सभी चिन्ह भक्त के भी हो जाते हैं।
[ ५ ] सायुज्य: –यह सारूप्य से भी आगे की मुक्ति है। इसका अर्थ है ” एकत्व ”। इसमें भक्त भगवान से अभिन्न हो जाता है। यह ज्ञानियों को तथा भगवान द्वारा मारे जाने वाले असुरों की होती है। प्रेमी [ ज्ञानी ] भक्त भगवान की सेवा को छोड़कर , उक्त सभी मुक्तियाँ भगवान द्वारा दिए जाने पर भी स्वीकार नहीं करता। वह केवल भगवान की सेवा करके , उनको सुख देना चाहता है। भक्त प्रेम का एक ही मतलब जानता है , देना , देना और देना। अपने सुख के लिए वह कोई काम नहीं करता। अद्वेत सिद्धांत से जो मोक्ष होता है , उसमें जड़ता [ संसार ] से सम्बन्ध विच्छेद की मुख्यता रहती है और भक्ति से जो मोक्ष होता है , उसमें चिन्मय तत्व के साथ एकता की मुख्यता होती है।
                   इन सबसे विलक्षण बड़ी मुक्ति जो जीते जी अपने आप को जान लेवे वो है जीवन मुक्ति।

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